Bilaspur High Court: पति-पत्नी और वो: विवाह के दौरान जन्मे बच्चों को पति का ही संतान माना जाएगा: भले ही अन्य पुरुष....
Bilaspur High Court: पितृत्व निर्धारण को लेकर बिलासपुर हाई कोर्ट के डिवीजन बेंच ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जस्टिस रजनी दुबे व जस्टिस एके प्रसाद की डिवीजन बेंच ने कहा कि विवाह के दौरान जन्मे बच्चों को पिता की संतान माना जाएगा। भले ही अन्य पुरुष उन बच्चों को अपनी संतान स्वीकार कर ले, या फिर महिला के साथ लिव-इन में रहे। बच्चों की कानूनी वैधता पहले पति से जुड़ी रहेगी।

Bilaspur High Court: बिलासपुर। पितृत्व निर्धारण को लेकर बिलासपुर हाई कोर्ट के डिवीजन बेंच ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जस्टिस रजनी दुबे व जस्टिस एके प्रसाद की डिवीजन बेंच ने कहा कि विवाह के दौरान जन्मे बच्चों को पिता की संतान माना जाएगा। भले ही अन्य पुरुष उन बच्चों को अपनी संतान स्वीकार कर ले, या फिर महिला के साथ लिव-इन में रहे। बच्चों की कानूनी वैधता पहले पति से जुड़ी रहेगी।
डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा है, यदि किसी महिला की शादी कानूनी रूप से अस्तित्व में है, तो उस दौरान पैदा हुए बच्चों को कानूनी रूप से पति का ही माना जाएगा। शादी शुदा महिला के दूसरे पुरुष से हुए बच्चे कानूनी रूप से पहले पति के ही माने जाएंगे।विवाह अस्तित्व में रहने के दौरान भले ही कोई अन्य व्यक्ति उन बच्चों को अपनी संतान स्वीकार कर ले या फिर महिला दूसरे पुरुष के साथ लिव-इन में रहे। उन बच्चों की कानूनी वैधता पहले पति के साथ ही जुड़ी रहेगी।
दो महिलाओं ने खुद को बिलासपुर के एक कारोबारी की बेटियां और उनकी मां को उनकी वैध पत्नी घोषित करने की मांग की थी। डिवीजन बेंच ने याचिका की सुनवाई के दौरान पाया कि महिला का विवाह वर्ष 1960 में हुआ था। वैवाहिक संबंध लगातार चलते रहा है। कानूनी रूप से कभी समाप्त नहीं हुई। मसलन पहले पति ने ना तो विवाह विच्छेद को लेकर परिवार न्यायालय में मामला दायर किया और ना ही विवाह विच्छेद को लेकर किसी तरह का कानूनी प्रमाण भी है। पति की मृत्यु का कोई सबूत भी पेश नहीं कर पाई। इस तरह की परिस्थितियों में हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 5 और 11 के तहत दूसरा विवाह शून्य माना जाएगा।
छत्तीसगढ़ बिलासपुर के लिंक रोड और मुंगेली निवासी दो महिलाओं ने परिवार न्यायालय में वाद दायर कर दावा किया था कि उनकी मां का वर्ष 1971 में गोड़पारा निवासी एक कारोबारी के साथ वरमाला विवाह हुआ था। विवाह के बाद उन दोनों का जन्म हुआ। दोनों बेटियों ने परिवार न्यायालय को बताया कि उनकी मां के पहले पति वर्ष 1984 में घर छोड़कर चले गए थे और तब से उनका कोई पता नहीं है। दायर वाद में बेटियों ने बताया कि मां के दूसरे पति और हमारे कारोबारी पिता ने आजीवन हमें बेटियों की तरह माना और स्वीकार भी किया। पिता ने अदालत में भी इस बात को स्वीकार किया था। मामले की सुनवाई के बाद परिवार न्यायालय में मामले को खारिज कर दिया था।
परिवार न्यायालय के फैसले को हाई कोर्ट में दी थी चुनौत
परिवार न्यायालय के फैसले को चुनौती देते हुए दोनों बेटियों ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। मामले की सुनवाई के बाद डिवीजन बेंच ने कहा, दूसरे पति द्वारा संतान के रूप में स्वीकारोक्ति के बयान से कानूनी व्यवस्थाओं और प्रावधानों को नकारा नहीं जा सकता। डिवीजन बेंच ने कहा, भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 112 के तहत विवाह के दौरान जन्मे बच्चों को पति की संतान मानने की कानूनी धारणा मजबूत होती है। इस दौरान पत्नी दूसरे पुरुष के साथ लिव-इन में क्यों ना रहे। लिव-इन के दौरान बच्चे के जन्म को साबित करने के लिए नान-एक्सेस याने पति-पत्नी के बीच शारीरिक संबंध ना बनने की बात को चिकित्सकीय प्रमाण के साथ पेश करना होगा। बेंच ने कहा, इस मामले में इस तरह का कोई ठोस सबूत याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश नहीं किया गया है। बेंच ने यह भी कहा,आधार कार्ड सहित अन्य दस्तावेजों में बच्चों के पिता के रूप में पहले पति का नाम दर्ज है। इस टिप्पणी के साथ डिवीजन बेंच ने याचिका को खारिज करते हुए यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।
क्या था पूरा मामला
यह मामला बिलासपुर का है, जहां कु. दुर्गेश नंदनी और संतोषी जांगड़े ने अपनी मां चंद्रकली के साथ मिलकर बृजमोहन दुआ के खिलाफ मुकदमा दायर किया था। उनकी मांग थी कि, चंद्रकली को बृजमोहन दुआ की कानूनी पत्नी घोषित किया जाए। दुर्गेश नंदनी और संतोषी को बृजमोहन की बेटियां (उत्तराधिकारी) माना जाए।
वादी (चंद्रकली) का कहना था कि उसकी शादी 1960 में आत्मप्रकाश से हुई थी, लेकिन वह आध्यात्मिक प्रवृत्ति का था और 1984 में घर छोड़कर चला गया। इस बीच 1971 में चंद्रकली ने बृजमोहन दुआ से वरमाला डालकर शादी कर ली और वे पति-पत्नी की तरह रहने लगे। चौंकाने वाली बात यह थी कि बृजमोहन दुआ ने कोर्ट में खुद स्वीकार किया कि चंद्रकली उनकी पत्नी है और दोनों बेटियां उनकी हैं।
हाईकोर्ट ने इसलिए खारिज किया दावा
जस्टिस रजनी दुबे और जस्टिस अमितेन्द्र किशोर प्रसाद की खंडपीठ ने निचली अदालत (फैमिली कोर्ट) के फैसले को बरकरार रखते हुए अपील खारिज कर दी। कोर्ट ने अपने फैसले में मुख्य रूप से तीन बातें कहीं:
शादी अवैध
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 5(आई) के अनुसार, यदि पति या पत्नी जीवित हैं और तलाक नहीं हुआ है, तो दूसरी शादी कानूनी रूप से अमान्य है। चूंकि चंद्रकली और आत्मप्रकाश का तलाक नहीं हुआ था, इसलिए बृजमोहन के साथ उनकी शादी की कोई कानूनी अहमियत नहीं है।
सरकारी दस्तावेजों का महत्व
कोर्ट ने पाया कि आधार कार्ड और अन्य सरकारी दस्तावेजों में आज भी बेटियों के पिता के नाम के रूप में आत्मप्रकाश का ही उल्लेख है।
पितृत्व का कानून
कानून यह मानता है कि शादी के दौरान पैदा हुए बच्चे उसी पति के माने जाएंगे जिससे महिला की वैध शादी हुई है। कोर्ट ने कहा कि केवल बृजमोहन के स्वीकार कर लेने से कानून नहीं बदल जाता।
फैमिली कोर्ट का फैसला बरकरार रखा
अदालत ने माना कि यह मुकदमा संपत्ति के विवाद से जुड़ा था। कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि वैधानिक प्रावधानों को केवल आपसी सहमति या बयानों से दरकिनार नहीं किया जा सकता। इस फैसले के बाद अब अपीलकर्ताओं को बृजमोहन दुआ की संपत्ति या नाम पर कानूनी हक नहीं मिल सकेगा।
हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि मामले में सभी साक्ष्यों और कानूनी प्रावधानों का सही मूल्यांकन किया गया है। इसलिए अपील में कोई दम नहीं है।
नहीं दिया जा सकता पत्नी व बेटी का दर्जा
हाईकोर्ट ने अपील खारिज करते हुए कहा कि, दुर्गेश नंदनी और संतोषी जांगड़े को ब्रजमोहन दुआ की बेटियां घोषित नहीं किया जा सकता और चंद्रकली को उनकी पत्नी का दर्जा नहीं दिया जा सकता। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि, भले ही ब्रजमोहन दुआ ने उन्हें अपनी बेटियां स्वीकार किया हो, लेकिन कोई भी स्वीकारोक्ति कानून के खिलाफ जाकर रिश्ते नहीं बना सकती।
