Bilaspur High Court News: मुस्लिम कानून: दो साल तक भरण-पोषण नहीं देने पर पत्नी को है तलाक लेने का अधिकार, हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले को रखा बरकरार
Bilaspur High Court News: पत्नी ने मुस्लिम कानून का हवाला देते हुए परिवार न्यायालय में तलाक का याचिका पेश की थी। मामले की सुनवाई के बाद फैमिली कोर्ट ने पत्नी की याचिका को स्वीकार करते हुए तलाक की डिक्री पारित कर दी। मुस्लिम कानून में यह व्यवस्था है कि यदि पति दो साल तक पत्नी को भरण-पोषण नहीं देता है, तब ऐसी स्थिति में पत्नी को तलाक का अधिकार है, भले ही वह पति से अलग रह रही हो। हाई कोर्ट ने पेश दस्तावेजों के आधार पर पाया कि मई 2016 से अब तक करीब आठ साल की अवधि में पति ने पत्नी को कोई भरण-पोषण नहीं दिया। हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए पति की याचिका को खारिज कर दिया है।

Bilaspur High Court News: बिलासपुर। पत्नी ने मुस्लिम कानून का हवाला देते हुए परिवार न्यायालय में तलाक का याचिका पेश की थी। मामले की सुनवाई के बाद फैमिली कोर्ट ने पत्नी की याचिका को स्वीकार करते हुए तलाक की डिक्री पारित कर दी। मुस्लिम कानून में यह व्यवस्था है कि यदि पति दो साल तक पत्नी को भरण-पोषण नहीं देता है, तब ऐसी स्थिति में पत्नी को तलाक का अधिकार है, भले ही वह पति से अलग रह रही हो। हाई कोर्ट ने पेश दस्तावेजों के आधार पर पाया कि मई 2016 से अब तक करीब आठ साल की अवधि में पति ने पत्नी को कोई भरण-पोषण नहीं दिया। हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए पति की याचिका को खारिज कर दिया है।
पति ने फैमिली कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस संजय कुमार जायसवाल की डिवीजन बेंच ने फैमिली कोर्ट के फैसले को आंशिक रूप से सही ठहराते हुए पति की याचिका को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने पत्नी द्वारा पति पर लगाए गए क्रूरता के आरोप को खारिज कर दिया है।
झारखंड के बोकारो जिले के इस्लामपुर निवासी मुस्लिम महिला का छत्तीसगढ़ निवासी व्यक्ति से 30 सितंबर 2015 को मुस्लिम रीति-रिवाज से निकाह हुआ था। निकाह के 15 दिन बाद ही पति-पत्नी के बीच विवाद शुरू हो गया। विवाद के बीच पत्नी मायके चली गई, तब से वह वहीं रह रही है। पति-पत्नी के बीच अलगाव की स्थिति है।
इसी बची पत्नी ने पति पर उसके नाम से बैंक में एफडी को तोड़वाने की कोशिश की शिकायत पुलिस में दर्ज कराई। पति और उसके परिजनों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई। इस पर पुलिस ने पति व परिजनों के खिलाफ आईपीसी की धारा 498ए, 506 और 34 के तहत एफआईआर दर्ज कर लिया।
मामले की सुनवाई ट्र्रायल कोर्ट में चली। ट्रायल कोर्ट ने पति और उसके परिजनों से आपराधिक प्रकरण से बरी कर दिया। ट्रायल कोर्ट के फैसले के बाद पत्नी ने पति पर क्रूरता का आरोप लगाती हुई व मुस्लिम कानून में दी गई व्यवस्थाओं का हवाला देते हुए फैमिली कोर्ट में याचिका दायर कर भरण पोषण की मांग की।
मामले की सुनवाई करते हुए फैमिली कोर्ट ने मुस्लिम विवाह विच्छेद एक्ट, 1939 की धारा 2 (ii) और धारा 2 (viii) (d) के आधार पर पत्नी के पक्ष में तलाक की डिक्री पारित कर दी। फैमिली कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए पति ने अपने अधिवक्ता के माध्यम से हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका की सुनवाई हाई कोर्ट के डिवीजन बेंच में हुई।
मामले की सुनवाई के बाद कोर्ट ने मुस्लिम कानून में दी गई व्यवस्थाओं का जिक्र करते हुए पति की याचिका को खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट के फैसले को आंशिक रूप से सही ठहराया है। याचिकाकर्ता पति को राहत देते हुए कोर्ट ने पत्नी द्वारा उस पर लगाए गए क्रूरता के आरोप को नकार दिया है। कोर्ट ने पति को क्रूरता के आरोप से बाहर कर दिया है।
