Bilaspur High Court: हाई कोर्ट ने कहा- बलात्कार नारीत्व का अपमान, एक महिला के खिलाफ सबसे गंभीर और जघन्य अपराध में से एक.....
Bilaspur High Court: बलात्कार के आरोप में जेल में बंद आरोपी की याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस एनके व्यास के सिंगल बेंच ने तल्ख टिप्पणी की है। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, बलात्कार नारीत्व का अपमान है।

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4 February 2026|बिलासपुर। बिलासपुर हाईकोर्ट में बलात्कार के आरोप में जेल में बंद आरोपी की याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस एनके व्यास के सिंगल बेंच ने तल्ख टिप्पणी की है। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, बलात्कार नारीत्व का अपमान है। एक महिला के खिलाफ सबसे गंभीर और जघन्य अपरोध में से एक है। इस टिप्पणी के साथ हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए याचिका को खारिज कर दिया है।
याचिकाकर्ता महावीर चैक ने ट्रायल कोर्ट के फैसले काे चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में अपील पेश की थी। याचिका में कहा है, उसके और महिला के बीच अवैध संबंध पहले से थे। आपसी सहमति से महिला ने शारीरिक संबंध स्थापित की थी। पति के सामने आ जाने के बाद झूठी शिकायत दर्ज करा दी है। मामले की सुनवाई जस्टिस एनके व्यास के सिंगल बेंच में हुई। सिंगल बेंच ने अपने फैसले में कहा है, बलात्कार का अपराध "नारीत्व का अपमान" है। यह संविधान के अनुच्छेद 21 के कई पहलुओं मसलन गरिमा, शारीरिक निजता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का खुला उल्लंघन है। बलात्कार खुद नारीत्व का अपमान है। यह उसकी गरिमा, शालीनता और सम्मान की जड़ पर चोट करता है। यह अपराध गहरा और स्थायी आघात पहुंचाता है, जिससे उसकी आत्म-सम्मान, स्वायत्तता और आत्मविश्वास टूट जाता है।
हाई कोर्ट की गंभीर टिप्पणी
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है, यह सिर्फ़ एक महिला के खिलाफ अपराध नहीं है, बल्कि पूरे समाज के खिलाफ अपराध है। ऐसा कृत्य भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत सबसे कीमती मौलिक अधिकार, गरिमा के साथ जीवन जीने के अधिकार, शारीरिक निजता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का क्रूर उल्लंघन है। इस टिप्पणी के साथ हाई कोर्ट ने सेशन जज के फैसले को यथावत रखते हुए याचिका को खारिज कर दिया है। सेशन जज ने IPC की धारा 506 (आपराधिक धमकी), 323 (जानबूझकर चोट पहुंचाने की सज़ा), 342 (गलत तरीके से कैद करना), और 376 (बलात्कार) के तहत दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी।
ये है मामला
दुष्कर्म पीड़िता का पति काम के लिए बाहर गया था। घटना की रात वह घर नहीं लौटा। पति के घर नहीं आने पर पीड़िता उसे ढूंढने निकली, उसी वक्त याचिकाकर्ता आरोपी ने उसे रोका और कुल्हाड़ी दिखाकर धमकाया और जबरदस्ती अपने घर ले गया। जहां उसने उसके साथ तीन बार बलात्कार किया। बाद में पीड़िता के पति के आने पर याचिकाकर्ता भाग गया।
याचिका में कही ये बातें
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने कोर्ट के सामने तर्क दिया और कहा, पीड़िता और याचिकाकर्ता ने सहमति से संबंध बनाया है। ऐसा कोई रिकॉर्ड नहीं है, जिससे यह साबित हो कि उसने शोर मचाया या विरोध किया। उसने कहा कि उसके और पीड़िता के बीच अवैध संबंध थे। जब उसके पति ने उसे देख लिया तो उसने एक कहानी बनाई। अधिवक्ता ने यह भी तर्क दिया, पीड़िता के गुप्तांगों पर कोई चोट नहीं थी, जो बलात्कार के आरोप को खारिज करता है।
कोर्ट ने अपने फैसले में ये कहा
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, डर या गलतफहमी से ली गई सहमति मान्य सहमति नहीं होती। पीड़ित के अकेले बयान के आधार पर सज़ा दी जा सकती है, बशर्ते ऐसा बयान भरोसेमंद हो। अभियोजन पक्ष द्वारा रिकॉर्ड पर लाए गए सबूत, पीड़िता का बयान जो अभियोजन पक्ष के मामले में भरोसा दिलाता है, क्योंकि उसने बताया है कि कैसे उसके साथ कुल्हाड़ी की नोक पर बलात्कार किया गया। मेडिकल रिपोर्ट में दाहिने घुटने, पैर के पिछले हिस्से और दाहिनी कोहनी पर चोटें साफ दिखाती हैं कि यह सहमति का मामला नहीं था। इन टिप्पणियों के साथ हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए याचिका को खारिज कर दिया है।
