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Bilaspur High Court: हाई कोर्ट ने कहा: जातियों के निर्धारण में राष्ट्रपति का आदेश अंतिम और निर्णायक, इसलिए यहां लागू नहीं होगा 170 ख का मामला....

Bilaspur High Court: राजस्व प्रकरण पर फैसला सुनाते हुए जस्टिस बीडी गुरु ने कहा, धारा 170(ख) केवल तभी लागू होती है जब अनुसूचित जनजाति के किसी व्यक्ति द्वारा गैर-आदिवासी के पक्ष में भूमि का हस्तांतरण सिद्ध हो जाता है...

Bilaspur High Court: हाई कोर्ट ने कहा: जातियों के निर्धारण में राष्ट्रपति का आदेश अंतिम और निर्णायक, इसलिए यहां लागू नहीं होगा 170 ख का मामला....
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इमेज सोर्स- गूगल, एडिट बाय- NPG News

By Radhakishan Sharma

10 फरवरी 2026बिलासपुर। राजस्व प्रकरण पर फैसला सुनाते हुए जस्टिस बीडी गुरु ने कहा, धारा 170(ख) केवल तभी लागू होती है जब अनुसूचित जनजाति के किसी व्यक्ति द्वारा गैर-आदिवासी के पक्ष में भूमि का हस्तांतरण सिद्ध हो जाता है, मौजूदा मामले में यह सिद्ध नहीं हो पाया है। प्रथम अपीलीय न्यायालय ने विधि का गंभीर उल्लंघन किया है। इस टिप्पणी के साथ हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता की अपील को स्वीकार कतरे हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है।

जस्टिस गुरु ने अपनेन फैसले में कहा है, वैधानिक प्रावधानों, अधिसूचनाओं और अभिलेख में उपलब्ध सामग्री की सावधानीपूर्वक जांच करने पर, इस न्यायालय का यह मत है कि प्रथम अपीलीय न्यायालय ने विधि का गंभीर उल्लंघन किया है। यह सर्वविदित है कि किसी जाति या समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा क्षेत्र-विशिष्ट होता है और इसका निर्धारण केवल भारत के संविधान के अनुच्छेद 342 के अंतर्गत समय-समय पर राष्ट्रपति के आदेश के आधार पर ही संशोधित किया जा सकता है। कोर्ट ने कहा, न्यायालयों के पास भारत के संविधान के अनुच्छेद 342 के तहत अधिसूचित अनुसूचित जनजातियों की सूची में कुछ जोड़ने, घटाने या संशोधित करने की कोई शक्ति नहीं है, और राष्ट्रपति का आदेश अंतिम और निर्णायक है।

याचिकाकर्ता टेक राम ने सिविल प्रक्रिया संहिता, CPC 1908 की धारा 100 के तहत तृतीय अतिरिक्त जिला न्यायाधीश, जांजगीर, जिला जांजगीर-चंपा द्वारा सिविल अपील में 20 जनवरी 2015 को पारित निर्णय एवं डिक्री के विरुद्ध यह दूसरी अपील दायर की थी, जिसमें प्रतिवादियों की अपील को ट्रायल कोर्ट के उस निर्णय को पलटते हुए स्वीकार कर लिया गया है, जो सिविल जज, द्वितीय श्रेणी-द्वितीय, पामगढ़ द्वारा सिविल सूट में 31 जुलाई .2010 को पारित निर्णय एवं डिक्री के विरुद्ध दायर की गई थी, जिसमें ट्रायल जज ने याचिकाकर्ता के सूट को स्वीकार कर लिया था।

याचिकाकर्ता ने स्थायी निषेधाज्ञा और वैकल्पिक रूप से वाद भूमि पर कब्ज़ा प्राप्त करने के लिए मुकदमा दायर किया था। यह दलील दी गई कि वाद भूमि 11 मार्च, 1977 से पहले राजस्व अभिलेखों में सत्राजित सिंह के वंशज अशोक कुमार सिंह और मनहरन सिंह के नाम पर दर्ज थी। विधिवत सत्यापन के बाद, याचिकाकर्ता ने वाद भूमि को उसके पूर्व स्वामियों, मनहरन सिंह और अन्य से 11 मार्च, 1977 की पंजीकृत विक्रय विलेख के माध्यम से 1000 रुपये में खरीदा, जिससे उसे वाद भूमि का स्वामित्व और कब्ज़ा प्राप्त हो गया। याचिकाकर्ता ने 28 मई, 1977 को वाद भूमि को अपने नाम पर दर्ज कराया। वह वाद भूमि पर खेती कर रहा है और अभी भी उस पर उसका कब्ज़ा है। 22 सितंबर, 2004 को प्रतिवादियों गुनाराम, गजाराम व लच्छाराम ने याचिकाकर्ता को धमकी देते हुए कहा कि उन्होंने विवादित भूमि के अभिलेखों से उनका नाम हटाकर अपना नाम दर्ज करा लिया है, इसलिए विवादित भूमि का कब्ज़ा उन्हें सौंप देना चाहिए।

जाति का उठाया बड़ा मुद्दा

याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में बताया है, प्रतिवादियों ने उन्हें यह भी बताया कि उन्होंने राजस्व अभिलेखों में अपना नाम अनुसूचित जनजाति के सदस्य बताकर दर्ज कराया है, जबकि प्रतिवादी शिकारी जाति से संबंध रखते हैं, जो जांजगीर तहसील में अनुसूचित जनजाति नहीं है। ऐसी स्थिति में, यदि उन्होंने अनुसूचित जनजाति के सदस्य होने का दावा करते हुए राजस्व अभिलेखों में अपना नाम दर्ज कराया है, तो वह आदेश अवैध और अधिकार क्षेत्र से बाहर है और इसलिए याचिकाकर्ता पर बाध्यकारी नहीं है। वाद भूमि के संबंध में एक स्थायी निषेधाज्ञा जारी करने की मांग करते हुए प्रतिवादियों से वाद भूमि का कब्जा लेने की अनुमति दिलाने की गुहार लगाई।

पक्षकारों ने दिया ये तर्क

पक्षकारों ने अपने लिखित बयान में याचिकाकर्ता के वाद भूमि पर स्वामित्व और कब्जे से इनकार किया है और तर्क दिया है कि यह भूमि मूल रूप से शिकारी समुदाय (आदिवासी जनजातियों से संबंधित) के खोलबहरा और शिवसिंह की थी। सक्षम प्राधिकारी की अनुमति के बिना, भूमि को अवैध रूप से सत्राजित सिंह के नाम पर हस्तांतरित कर दिया गया था, जिनके पास हस्तांतरण का कोई वैध अधिकार नहीं था। याचिकाकर्ता ने कभी भी वैध स्वामित्व या कब्जा प्राप्त नहीं किया। पक्षकारों ने बताया, छत्तीसगढ़ भूमि राजस्व संहिता, 1959 (संक्षेप में 'संहिता') की धारा 170(बी) के तहत जांजगीर के उप-विभागीय अधिकारी के समक्ष कार्यवाही शुरू की गई थी, जिसमें याचिकाकर्ता की सुनवाई के बाद, हम सभी के पक्ष में भूमि को बहाल करने का आदेश पारित किया गया था, जिसके बाद उन्हें कब्जा सौंप दिया गया था। याचिकाकर्ता ने न तो उक्त आदेश को चुनौती दी और न ही कोई आपत्ति उठाई।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने कहा, संहिता की धारा 170(बी) और 257 के मद्देनजर, सिविल न्यायालय का क्षेत्राधिकार वर्जित है, और इसलिए यह मुकदमा सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश VII नियम 11(डी) के तहत खारिज किए जाने योग्य है, और निषेधाज्ञा की कोई राहत नहीं दी जा सकती है।

ये है प्रथम अपीलीय न्यायालय का आदेश

प्रथम अपीलीय न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा है कि निचली अदालत ने लेन-देन की तारीख को प्रचलित कानूनी स्थिति की जांच करने के बजाय बाद की अधिसूचनाओं के आधार पर शिकारी समुदाय की स्थिति निर्धारित करके कानून में स्पष्ट त्रुटि की है। संहिता की धारा 165 के तहत जारी 02 दिसंबर 1960 की राजपत्र अधिसूचना के अनुसार, 15 जनवरी .1965 की बिक्री के समय शिकारी समुदाय को अनुसूचित जनजाति घोषित किया गया था। तदनुसार, रामहू नामक एक आदिवासी द्वारा एक गैर-आदिवासी के पक्ष में वाद भूमि का हस्तांतरण संहिता की धारा 170(ख) के प्रावधानों के अंतर्गत आता है। अपीलीय न्यायालय ने आगे कहा कि धारा 170(ख) के अंतर्गत कार्यवाही राजस्व न्यायालयों के अनन्य क्षेत्राधिकार में आता है और संहिता की धारा 257 के तहत सिविल न्यायालय का क्षेत्राधिकार वर्जित है। उपमंडल अधिकारी द्वारा 26 अगस्त 1996 को पारित आदेश, जिसमें रामहू के कानूनी वारिसों को भूमि वापस देने का निर्देश दिया गया था, वैध माना गया। परिणामस्वरूप, निचली अदालत के फैसले और निर्णय को रद्द कर दिया गया और मुकदमा खारिज कर दिया।

बिलासपुर और कटघोरा तहसील में शिकारी समुदाय को अजजा को मिला है दर्जा

याचिकाकर्ता के वकील ने पैरवी करते हुए कोर्ट को बताया, प्रथम अपीलीय न्यायालय ने जांजगीर-चंपा जिले में 'शिकारी' जाति को अनुसूचित जनजाति मानने में कानून की स्पष्ट त्रुटि की है। उन्होंने संविधान (अनुसूचित जनजाति) आदेश, 1950, अध्याय 1 के तहत जारी राजपत्र अधिसूचना पर भी भरोसा जताया है। भाग-VIII (मध्य प्रदेश) में यह तर्क दिया गया है कि शिकारी समुदाय को केवल बिलासपुर जिले की बिलासपुर और कटघोरा तहसीलों में ही अनुसूचित जनजाति के रूप में अधिसूचित किया गया है। उक्त अधिसूचना में, भाग-VIII (मध्य प्रदेश) में यह तर्क दिया गया है कि शिकारी समुदाय को केवल बिलासपुर जिले की बिलासपुर और कटघोरा तहसीलों में ही अनुसूचित जनजाति के रूप में अधिसूचित किया गया है। उक्त अधिसूचना में जांजगीर जिले की पामगढ़ तहसील का कोई उल्लेख नहीं है। इस आधार पर विवादित निर्णय और डिक्री को रद्द करने की मांग की है।

हाई कोर्ट का फैसला

याचिका की सुनवाई के बाद जस्टिस बीडी गुरु ने अपने फैसले में कहा है, उप-विभागीय अधिकारी के समक्ष कार्यवाही की आदेश पुस्तिका से ही स्पष्ट है कि छत्तीसगढ़ की अनुसूचित जनजातियों की सूची में शिकारी जाति क्रमांक 36 पर अंकित है। हालांकि, उक्त दस्तावेज से यह भी स्पष्ट होता है कि जांजगीर और पामगढ़ तहसील दोनों में ही शिकारी जाति को अनुसूचित जनजाति के रूप में मान्यता नहीं दी गई है, जो तथ्य रिकॉर्ड में विधिवत दर्ज है। इस तथ्य को पामगढ़ के नायब तहसीलदार ने 14 जनवरी 2008 को स्पष्ट रूप से दर्ज किया है।

कोर्ट ने कहा, यहां यह उल्लेख करना उल्लेखनीय है कि प्रारंभिक आदेश, अर्थात् संविधान (अनुसूचित जनजाति) आदेश, 1950, जो 6 सितंबर, 1950 को जारी किया गया था, में मध्य प्रदेश की अनुसूची भाग-IV में राज्य के विभिन्न भागों, जिनमें बिलासपुर जिले की कटघोरा तहसील भी शामिल है, के लिए अनुसूचित जनजातियों (आदिवासी जनजातियों से संबंधित) की कई जातियों को दर्शाया गया है, हालांकि, उक्त अनुसूची में विषय समुदाय, अर्थात् शिकारी का कोई उल्लेख नहीं है। पहली बार, 20 सितंबर, 1976 को जारी राजपत्र अधिसूचना में इसका उल्लेख किया गया है।

जांजगीर जिले में शिकारी जाति को अनुसूचित जनजाति के रूप में वैधानिक मान्यता प्राप्त न होने के कारण, संहिता की धारा 170(ख) के प्रावधान लागू नहीं किए जा सकते थे। धारा 170(ख) केवल तभी लागू होती है जब अनुसूचित जनजाति के किसी व्यक्ति द्वारा गैर-आदिवासी के पक्ष में भूमि का हस्तांतरण सिद्ध हो जाता है। चूंकि अधिसूचित क्षेत्र में हस्तांतरणकर्ता का अनुसूचित जनजाति से संबंधित होना आवश्यक क्षेत्राधिकार संबंधी तथ्य सिद्ध नहीं हुआ था, इसलिए धारा 170(ख) के तहत प्रारंभ की गई कार्यवाही पूर्णतः क्षेत्राधिकार से बाहर थी। फलस्वरूप, उप-विभागीय अधिकारी द्वारा वाद भूमि की बहाली का निर्देश देने वाला आदेश याचिकाकर्ता को उसके वैध अधिकारों से वंचित नहीं कर सकता, न ही ऐसा आदेश संहिता की धारा 257 के तहत सिविल न्यायालय के क्षेत्राधिकार को बाधित कर सकता है।

हाई कोर्ट की तल्ख टिप्पणी, विधि का किया गंभीर उल्लंघन

जस्टिस बीडी गुरु ने अपने फैसले में कहा, वैधानिक प्रावधानों, अधिसूचनाओं और अभिलेख में उपलब्ध सामग्री की सावधानीपूर्वक जांच करने पर, इस न्यायालय का यह मत है कि प्रथम अपीलीय न्यायालय ने विधि का गंभीर उल्लंघन किया है। यह सर्वविदित है कि किसी जाति या समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा क्षेत्र-विशिष्ट होता है और इसका निर्धारण केवल भारत के संविधान के अनुच्छेद 342 के अंतर्गत समय-समय पर राष्ट्रपति के आदेश के आधार पर ही संशोधित किया जा सकता है। अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आदेश (संशोधन) अधिनियम, 1976 द्वारा संशोधित संविधान (अनुसूचित जनजाति) आदेश, 1950 (भाग-VIII, मध्य प्रदेश) स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि शिकारी समुदाय को केवल बिलासपुर जिले की बिलासपुर और कटघोरा तहसीलों में ही अनुसूचित जनजाति के रूप में अधिसूचित किया गया था। उक्त अधिसूचना में जांजगीर जिले की पामगढ़ तहसील का कोई उल्लेख नहीं है। अधिसूचना में स्वयं यह स्पष्ट किया गया है कि जिलों या प्रादेशिक मंडलों का संदर्भ कट-ऑफ तिथि पर यथावत माना जाएगा। प्रथम अपीलीय न्यायालय ने जांजगीर-चांपा जिले (केंद्र शासित प्रदेश) की पामगढ़ तहसील के धनगांव गांव के निवासी पक्षकारों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने में विधिगत त्रुटि की है और साथ ही सुविचारित निर्णय को पलटने में भी त्रुटि की है।

ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए याचिका को किया स्वीकार

वर्तमान मामले में, एक बार यह मान लिया जाए कि जांजगीर जिले के पामगढ़ तहसील में शिकारी जाति अनुसूचित जनजाति नहीं थी, तो संहिता की धारा 170(बी) लागू करने का आधार ही ध्वस्त हो जाता है। परिणामस्वरूप, उप-विभागीय अधिकारी के समक्ष कार्यवाही और 26 अगस्त.1996 का आदेश संहिता की धारा 257 के तहत रोक नहीं बन सकते। निचली अदालत ने उचित अधिकार क्षेत्र का प्रयोग किया और कब्जे से संबंधित साक्ष्यों का सही मूल्यांकन किया निचली अदालत द्वारा पारित आदेश को रद्द किया जाता है और ट्रायल कोर्ट द्वारा 31 जुलाई 2010 को पारित निर्णय और डिक्री को बहाल किया जाता है।

Radhakishan Sharma

राधाकिशन शर्मा: शिक्षा: बीएससी, एमए राजनीति शास्त्र व हिन्दी साहित्य में मास्टर डिग्री, वर्ष 1998 से देशबंधु से पत्रकारिता की शुरुआत। हरिभूमि व दैनिक भास्कर में बतौर सिटी रिपोर्टर काम किया। 2007 से जुलाई 2024 तक नईदुनिया में डिप्टी न्यूज एडिटर व सिटी चीफ के पद पर कार्य का लंबा अनुभव। 1 अगस्त 2024 से एनपीजी न्यूज में कार्यरत।

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