Basatar Naxalite: लाल आतंक के खात्मे का काउंटडाउन शुरू, 31 मार्च डेडलाइन, एक साल में 3000 नक्सली ढेर, 5000 माओवादी लड़ाकों ने किया सरेंडर
Basatar Naxalite: चार दशक तक बस्तर के जिस जंगल ने बंदूक की भाषा सुनी-समझी, वो आज निर्णायक खामोशी की दहलीज पर खड़ा है।

Basatar Naxalite: बस्तर अब केवल एक भौगोलिक इलाका नहीं है। यह भारतीय राज्य की दृढ़ता और धैर्य की परीक्षा का अंतिम अध्याय बन चुका है। चार दशक तक जिस जंगल ने बंदूक की भाषा सुनी, वह आज निर्णायक खामोशी की दहलीज पर खड़ा है। छत्तीसगढ़ में वामपंथ उग्रवाद को खत्म करने के लिए केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित डेडलाइन निर्णायक चरण में पहुंच गई है। 31 मार्च 2026 की समयसीमा अब दूर का राजनीतिक वादा नहीं, बल्कि दरवाजे पर दस्तक देती हकीकत है। करीब 51 दिन बचे हैं। सवाल यह नहीं कि अभियान चलेगा या नहीं। सवाल यह है कि क्या इस बार सचमुच ताबूत पर आखिरी कील ठोंकी जाएगी। रायपुर में हुई उच्चस्तरीय बैठक सामान्य समीक्षा नहीं थी। यह अंतिम चरण की ब्लूप्रिंट मीटिंग थी। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने स्पष्ट संकेत दिया है कि अब ऑपरेशन केवल रूटीन कार्रवाई नहीं रहेंगे। आईबी, सीआरपीएफ, बीएसएफ, राज्य पुलिस और डीआरजी के साथ हुई मैराथन बैठकों का मकसद एक ही था, अंतिम घेरा कसना। छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री विजय शर्मा ने भी संकेत दिया कि 31 मार्च से पहले यह संभवतः आखिरी बड़ी रणनीतिक बैठक है। इसका अर्थ साफ है, अब निर्णयों का समय है, बहस का नहीं। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय बार बार कह रहे हैं कि नक्सलवाद अंतिम सांसें ले रहा है। यह केवल राजनीतिक आशावाद नहीं, जमीनी संकेतों का प्रतिबिंब है। आज बस्तर के गांवों में राष्ट्रीय ध्वज फहर रहा है। सड़कें बन रही हैं। कैंप अंदर तक पहुंच चुके हैं। यदि यह रफ्तार बनी रही तो 31 मार्च 2026 केवल एक तारीख नहीं रहेगी, बल्कि भारत की आंतरिक सुरक्षा के इतिहास में दर्ज निर्णायक दिन होगी। यह लड़ाई केवल बंदूक की नहीं है। यह राज्य की विश्वसनीयता, लोकतंत्र की ताकत और विकास के अधिकार की लड़ाई है। और इस बार संकेत साफ हैं, बस्तर में कहानी अपने अंतिम अध्याय की ओर बढ़ चुकी है। इस बैठक के बाद नक्सल प्रभावित इलाकों में ऑपरेशन और ज्यादा तेज किए जा सकते हैं। इस तरह कुल मिलाकर अमित शाह का यह दौरा सिर्फ एक नियमित समीक्षा नहीं, बल्कि नक्सलवाद के खिलाफ तय समयसीमा से पहले आखिरी रणनीतिक बैठक के रूप में देखा जा रहा है। जिसका असर आने वाले महीनों में जमीनी हालात पर साफ दिख सकता है।
नक्सलवाद का सिमटता दायरा
बस्तर का भूगोल लंबे समय तक नक्सल हिंसा की पनाहगाह रहा। घने जंगल, ऊबड़ खाबड़ पहाड़ और सीमावर्ती राज्य इसकी रणनीतिक ढाल बने रहे। पर अब तस्वीर तेजी से बदल रही है। सुरक्षा एजेंसियों के आकलन के अनुसार हथियारबंद नक्सली सिमटकर केवल सुकमा, बीजापुर और नारायणपुर की सीमाओं के 6 से 7 जंगल पहाड़ी पॉकेट तक सीमित रह गए हैं। संख्या भी घटकर करीब 150 सक्रिय उग्रवादियों तक सिमट चुकी है। यह संकुचन महज आंकड़ा नहीं, बल्कि रणनीतिक बढ़त का संकेत है। लगातार संयुक्त ऑपरेशन, ड्रोन और तकनीकी निगरानी, स्थानीय खुफिया तंत्र की मजबूती तथा पड़ोसी राज्यों के साथ समन्वय ने नक्सल नेटवर्क की रीढ़ तोड़ी है। छत्तीसगढ़, तेलंगाना और आंध्रप्रदेश की त्रि-सीमा, नारायणपुर और गढ़चिरौली का सीमांत क्षेत्र, करेंगुट्टा की पहाड़ियां और कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान जैसे दुर्गम इलाके अब अंतिम ठिकानों के रूप में चिन्हित हैं। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने सार्वजनिक रूप से लक्ष्य रखा है कि 31 मार्च तक बस्तर से नक्सलवाद का समापन सुनिश्चित किया जाएगा। यह समयसीमा केवल राजनीतिक घोषणा नहीं, बल्कि सुरक्षा बलों के लिए स्पष्ट मिशन मोड है। बीते वर्षों में जिस तरह से कैडर टूटे हैं, शीर्ष नेतृत्व निष्क्रिय हुआ है और कई कमांडर मारे गए या आत्मसमर्पण कर चुके हैं, उससे यह लक्ष्य अब प्रतीकात्मक नहीं लगता। सूत्र बताते हैं कि फिलहाल केंद्रीय कमेटी के देवाजी और राज्य कैडर के पापा राव जैसे सीमित नेतृत्व ही सक्रिय हैं। नेतृत्व का यह संकुचन भी संगठनात्मक क्षरण का संकेत है। जब शीर्ष स्तर कमजोर पड़ता है तो विचारधारा की पकड़ भी ढीली होती है। लेकिन इस अंतिम चरण में सावधानी अनिवार्य है। इतिहास गवाह है कि जब भी उग्रवादी संगठन हाशिए पर जाते हैं, वे हताशा में बड़ी वारदात की कोशिश करते हैं। इसलिए ऑपरेशन के साथ साथ पुनर्वास नीति, आत्मसमर्पण पैकेज और स्थानीय विकास योजनाओं को भी समानांतर गति देनी होगी। नक्सलवाद का अंत केवल बंदूक से नहीं, विश्वास से होगा। यदि गांवों में सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की स्थायी व्यवस्था मजबूत होती रही, तो जंगल की ओर लौटने का आकर्षण स्वतः खत्म हो जाएगा। बस्तर अब निर्णायक मोड़ पर है। सात पॉकेट में सिमटा यह संकट संकेत देता है कि दशकों पुरानी हिंसा की छाया छंट रही है। शर्त यही है कि सुरक्षा की दृढ़ता और विकास की निरंतरता साथ साथ चलती रहे। तभी यह दावा इतिहास में दर्ज उपलब्धि बन पाएगा, न कि क्षणिक सफलता।
एक साल में 3000 नक्सली ढेर, 5 हजार सरेंडर
बीता वर्ष 2025 बस्तर के इतिहास में माओवाद की कमर टूटने के साल के रूप में दर्ज हुआ है। इसी वर्ष बसवा राजू और हिड़मा जैसे केंद्रीय समिति के शीर्ष माओवादी नेता मारे गए। 58 नए सुरक्षा कैंपों की स्थापना से माओवादियों का कोर एरिया अब सुरक्षा बलों के नियंत्रण में आ चुका है। जिन 40 गांवों में कभी काले झंडे लहराते थे, वहां इस साल पहली बार गणतंत्र दिवस पर तिरंगा फहराया गया। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि बचे हुए इलाकों में फोकस्ड ऑपरेशन से लक्ष्य संभव है। सरकार सुरक्षा के साथ विकास और विश्वास की नीति पर काम कर रही है। नए कैंप और योजनाओं से गांवों में भरोसा बढ़ा है और सहयोग मिल रहा है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि नक्सलवाद के विरुद्ध निर्णायक प्रगति के सशक्त संकेत है। डबल इंजन सरकार की सटीक सुरक्षा-केंद्रित रणनीति, सुदृढ़ आधारभूत संरचना, नक्सल फाइनेंशियल नेटवर्क पर कड़ा प्रहार तथा प्रभावी आत्मसमर्पण नीति के सकारात्मक परिणाम आए हैं। पीएम मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व और गृहमंत्री के सशक्त मार्गदर्शन में हम 31 मार्च तक छत्तीसगढ़ को नक्सलमुक्त बनाने के संकल्प को सिद्ध करने की दिशा में अग्रसर हैं। बैठक में अमित शाह ने कहा कि बस्तर देश के सबसे समृद्ध व सुंदर क्षेत्र में से एक है। नक्सलियों का सफाया कर इसका विकास प्राथमिकता के साथ करना है। सिक्योरिटी ट्रिक स्ट्रेटजी, इंफ्रास्ट्रक्चर, नक्सल फाइनेंशियल नेटवर्क पर प्रहार और आत्मसमर्पण नीति से सकारात्मक परिणाम आए हैं और इस 31 मार्च से पहले नक्सलवाद पूरी तरह समाप्त होने जा रहा है। बैठक में अफसरों ने डीजी कॉन्फ्रेंस के दौरान दिए गए निर्देश और पिछले 1 साल से चलाए जा रहे ऑपरेशन की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि लगातार नक्सली सभी राज्यों में सरेंडर करने के साथ मुठभेड़ में मारे जा रहे हैं। पिछले 1 साल में सभी प्रभावित राज्यों में करीब 3000 नक्सली मारे गए हैं वहीं करीब 5000 सरेंडर और बड़ी संख्या में गिरफ्तार किए गए हैं।
90 फीसदी बस्तर माओवाद मुक्त
बस्तर नक्सलमुक्ति की ओर बढ़ रहा है, लेकिन आईईडी बम अब भी सबसे बड़ा अदृश्य खतरा बना हुआ है। सुरक्षा बलों और निर्दोष ग्रामीणों की जान लेने वाला यह खतरा शांति की राह में बड़ी चुनौती बना है। बस्तर आज इतिहास के एक अहम मोड़ पर खड़ा है। दशकों तक नक्सल हिंसा की आग में झुलसने वाला यह इलाका अब नक्सलमुक्ति की दहलीज तक पहुंच चुका है। सुरक्षा बलों के आक्रामक अभियानों से नक्सल नेटवर्क लगभग ध्वस्त हो चुका है। लेकिन बंदूकें खामोश होने के बावजूद ज़मीन के नीचे छिपा एक अदृश्य दुश्मन-आईईडी-आज भी बस्तर के लिए सबसे बड़ा खतरा बना हुआ है। पुलिस अफसरों आकलन के मुताबिक, करीब 90 फीसदी नक्सली या तो मार जा चुके है या आत्मसमर्पण कर चुके हैं। माओवाद से 90 प्रतिशत क्षेत्र मुक्त हो चुका है और बहुत जल्दी ये बाकी के 10 फीसदी हिस्से भी खाली हो जाएंगे।
केंद्र और राज्य का पूरा फोकस बस्तर पर
पिछले दो वर्षों में यदि किसी भूभाग ने सत्ता के सर्वोच्च गलियारों का सबसे अधिक ध्यान खींचा है, तो वह बस्तर है। यह केवल प्रशासनिक सक्रियता नहीं, बल्कि स्पष्ट राजनीतिक और राष्ट्रीय प्राथमिकता का संकेत है। देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बार बार बस्तर आना, यहां रुककर कार्यक्रमों में हिस्सा लेना, और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु का तीन बार दौरा करना, यह दर्शाता है कि बस्तर अब हाशिये का इलाका नहीं रहा। सबसे उल्लेखनीय सक्रियता केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की रही है। उनका पंद्रह बार बस्तर दौरा करना और कई बार तीन तीन दिन तक कैंप कर सुरक्षा हालात की समीक्षा करना, यह सामान्य राजनीतिक औपचारिकता नहीं है। इसके अलावा देश के सर्वोच्च लोकतंत्र के मंदिर में बजट अभिभाषण के दौरान बस्तर का जिक्र प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से करना ये बताता है कि बस्तर सरकार की कितनी प्राथमिकता में है। ये उस रणनीतिक युद्ध का संकेत है, जिसमें लक्ष्य केवल नक्सल हिंसा को सीमित करना नहीं, बल्कि उसका समूल उन्मूलन है। बस्तर दशकों तक लाल आतंक की छाया में रहा। विकास की हर योजना बंदूक की नली से टकराती थी। लेकिन अब तस्वीर बदली है। सड़कें बन रही हैं, सुरक्षा कैंप आगे बढ़े हैं, स्कूल और स्वास्थ्य केंद्र दुर्गम इलाकों तक पहुंचे हैं। सुरक्षा ऑपरेशन और विकास परियोजनाएं साथ साथ चल रही हैं। यह दोहरी रणनीति ही इस बदलाव की असली ताकत है। सरकार का संदेश साफ है कि बस्तर को केवल सुरक्षा के नजरिये से नहीं, बल्कि सम्मान और अवसर के साथ देखना होगा। यदि जंगलों में गोलियों की जगह रोजगार की आवाज गूंजेगी, तभी शांति स्थायी होगी। आज बस्तर राष्ट्रीय संकल्प का प्रतीक बन चुका है। यह लड़ाई केवल नक्सलवाद के खिलाफ नहीं, बल्कि उस पिछड़ेपन के विरुद्ध है जिसने हिंसा को जन्म दिया। दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति, लगातार उच्चस्तरीय निगरानी और जमीनी क्रियान्वयन यदि इसी गति से जारी रहे, तो वह दिन दूर नहीं जब बस्तर लाल आतंक की नहीं, विकास और विश्वास की पहचान होगा।
तय हुई अंतिम रणनीति
छत्तीसगढ़ में वामपंथ उग्रवाद को खत्म करने के लिए केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित डेडलाइन निर्णायक चरण में पहुंच गई है। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में नवा रायपुर स्थित होटल में सुरक्षा समीक्षा बैठक में नक्सलवाद के खिलाफ निर्णायक रणनीति तय की गई। बता दे कि केंद्र सरकार की डेडलाइन 31 मार्च में अब 50 से भी कम दिन शेष बचे है। बैठक में शामिल अधिकारियों ने इसे एक महत्वपूर्ण रणनीतिक अभ्यास बताया। इसमें हाल राज्य के दिनों में मिली उपलब्धियों और नक्सल प्रभावित जिलों की अन्य चुनौतियों को दूर करने पर चर्चा की गई। बैठक की अध्यक्षता केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने की। इसमें मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय, डिप्टी सीएम और गृहमंत्री विजय शर्मा के साथ नक्सल प्रभावित राज्यों के डीजीपी, अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) और केंद्रीय व सुरक्षा एजेंसियों के वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए। इंटेलिजेंस का आकलन, ऑपरेशन की प्रगति, फोर्स की तैनाती का पैटर्न और अंतर राज्यीय समन्वय तंत्र की समीक्षा की गई। अधिकारियों ने बताया कि बैठक में नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में लगातार दबाव बनाना, उनके वित्तीय नेटवर्क और रसद सप्लाई के चेन को ध्वस्त करना और राज्य की सीमाओं के पार से निर्वाध समन्वय सुनिश्चित करने पर चर्चा हुई। बैठक को 31 मार्च तक नक्सल प्रभाव को खत्म करने के केंद्र के लक्ष्य से पहले अंतिम रणनीतिक समीक्षा मानी जा रही है।
बस्तर पंडुम का सियासी संदेश
जगदलपुर में बस्तर पंडुम का मंच सांस्कृतिक आयोजन जरूर था, पर उसका संदेश राजनीतिक और रणनीतिक दोनों था। 118 एकड़ में औद्योगिक क्षेत्र, हजारों करोड़ की सिंचाई परियोजना, रेल कनेक्टिविटी, कौशल प्रशिक्षण, यह सब बताता है कि सुरक्षा के साथ आर्थिक आधार भी खड़ा किया जा रहा है। जब जंगल के भीतर कैंप पहुंचते हैं और गांवों में स्कूल फिर खुलते हैं, तब यह केवल प्रशासनिक उपस्थिति नहीं होती। यह राज्य की वापसी होती है।
अंतिम चरण की असली चुनौती
इतिहास बताता है कि उग्रवाद का अंतिम चरण सबसे जोखिम भरा होता है। आईईडी अब भी अदृश्य खतरा है। 2025 में एएसपी सहित 12 जवान शहीद हुए। यह याद दिलाता है कि जीत की घोषणा से पहले चौकसी दोगुनी करनी होगी। सरकार का संदेश साफ है। जो हथियार छोड़ेंगे, उनके लिए पुनर्वास का रास्ता खुला है। जो बंदूक पकड़े रहेंगे, उनके लिए केवल दो विकल्प हैं, सरेंडर या मुठभेड़।
खौफ के खात्मे के बाद निखरेगा बस्तर का असली रंग
2026 में 20 लाख से ज्यादा सैलानियों के आने की संभावना, 2025 में 12 लाख टूरिस्ट पहुंचे। 2026 में बस्तर घूमने के लिए आने वाले पर्यटकों की संख्या में 60 से 70 þ बढ़ोतरी होने की संभावना जताई जा रही है। कभी नक्सलवाद के लिए पहचाना जाने वाला बस्तर अब तेजी से देश-विदेश के पर्यटकों का पसंदीदा पर्यटन स्थल बनता जा रहा है। 2025 में बस्तर जिले में देश-विदेश से करीब 12 लाख पर्यटक पहुंचे, जबकि 2026 में यह संख्या बढ़कर 20 लाख तक पहुंचने की उम्मीद है। यह बदलाव इलाके में बेहतर सुरक्षा व्यवस्था, पर्यटन विकास और सरकारी प्रयासों का नतीजा माना जा रहा है। बस्तर अपनी प्राकृतिक सुंदरता, घने जंगलों, झरनों, गुफाओं और आदिवासी संस्कृति के लिए प्रसिद्ध है। चित्रकोट जलप्रपात, तीरथगढ़, कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान, दंतेश्वरी मंदिर, बस्तर दशहरा, धुड़मारास गांव में बैंबू राफ्टिंग और आदिवासी हाट-बाजार पर्यटकों को आकर्षित कर रहे हैं। 2025 में पर्यटकों में बड़ी संख्या छत्तीसगढ़ के अलावा मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, दिल्ली, उत्तरप्रदेश और दक्षिण भारत के राज्यों से रही। यूरोप और एशियाई देशों से भी विदेशी पर्यटक बस्तर पहुंचे। पर्यटन विभाग के अनुसार, सुरक्षा हालात में सुधार के बाद पर्यटकों का भरोसा बढ़ा है। सड़कों, होमस्टे, रिसॉर्ट, गाइड सुविधा और डिजिटल कनेक्टिविटी के विस्तार से यात्रा पहले से ज्यादा आसान और सुरक्षित हो गई है। बस्तर के कई गांवों में होमस्टे मॉडल शुरू होने से स्थानीय लोगों को रोजगार मिला है। 2026 में पर्यटकों की संख्या में 60-70 प्रतिशत बढ़ोतरी का अनुमान है। पर्यटन बढ़ने से आर्थिक गतिविधि में तेजी, युवाओं के लिए रोजगार के मौके बढ़े स्थानीय व्यापारियों, होटल संचालकों और टैक्सी ड्राइवरों का कहना है कि पर्यटन बढ़ने से आर्थिक गतिविधियों में तेजी आई। युवाओं को रोजगार के नए अवसर मिल रहे हैं। बस्तर की सकारात्मक छवि देशभर में उभर रही है। आने वाले दिनों में यहां पर्यटन के क्षेत्र और भी तेजी देखने मिलेगी। लोग दूर-दूर से यहां आ रहे हैं।
विकास के रास्ते भी रणनीति का हिस्सा
सरकार का दावा है कि नक्सलवाद से लड़ाई केवल बंदूक से नहीं, बल्कि विकास से भी लड़ी जा रही है। 135 नए कैंप खुलने से स्वास्थ्य, शिक्षा और सड़क जैसी बुनियादी सुविधाएं गांवों तक पहुंची हैं। अमित शाह 9 फरवरी को बस्तर पंडूम के समापन समारोह में भी शामिल होंगे। यह संकेत है कि आदिवासी संस्कृति और विकास को सुरक्षा नीति से जोड़ा जा रहा है। केंद्र और छत्तीसगढ़ सरकार के बेहतर समन्वय ने अभियानों को नई धार दी है। अमित शाह का साफ संदेश है कि माओवादी या तो समर्पण कर मुख्यधारा में लौटें या कार्रवाई का सामना करें। अब केवल 50 दिन बचे हैं और इसी दौरान अंतिम फैसले जमीन पर उतरते दिखेंगे। बस्तर में नक्सलवाद के खात्मे के साथ बस्तर में 118 एकड़ रकबे में नया औद्योगिक क्षेत्र बनाया जा रहा है। सुकमा, दंतेवाड़ा और बीजापुर जिलों के 2.75 लाख हेक्टेयर खेतों की सिंचाई के लिए 3600 करोड़ की लागत से सिंचाई परियोजना भी शुरू की जाएगी। इससे 120 मेगावॉट बिजली पैदा होगी। बस्तर में एक भी सिंचाई परियोजना नहीं है। इसके चलते आदिवासी किसानों को बारिश पर ही निर्भर रहना पड़ता है। सिंचाई परियोजना से अब किसानों को खेतों को सींचने के लिए सिर्फ बारिश पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। 3300 करोड़ रुपए की लागत से रावघाट-जगदलपुर रेल प्रोजेक्ट पर भी जल्द काम शुरू किया जाएगा। नदी जोड़ो परियोजना पर भी लगातार काम चल रहा है। बस्तर के 90 हजार से ज्यादा युवाओं को विभिन्न व्यवसायों की ट्रेनिंग देकर उन्हें आगे बढ़ाया जाएगा। अगले 5 साल में बस्तर पूरे देश का सबसे ज्यादा विकसित और समृद्धशाली संभाग बनेगा।
31 मार्च 2026 तक माओवादी समस्या को जड़ से समाप्त करने की समयसीमा कायम है। सरकार एक भी गोली चलाना नहीं चाहती, लेकिन हिंसा का रास्ता चुनने वालों के लिए अब कोई भ्रम नहीं छोड़ा जाएगा।
अमित शाह, केंद्रीय गृहमंत्री
नक्सलवाद अब अंतिम सांसें ले रहा है और बस्तर तेजी से बदलाव की ओर बढ़ रहा है। केंद्र और राज्य की संयुक्त रणनीति से मार्च 2026 तक निर्णायक परिणाम सामने आएंगे।
विष्णु देव साय, मुख्यमंत्री
31 मार्च से पहले संभवतः यह आखिरी बड़ी रणनीतिक बैठक है। आने वाले दिनों में ऑपरेशन और तेज होंगे तथा निर्णायक फैसले लिए जाएंगे।
विजय शर्मा, डिप्टी सीएम
माओवादी अब सीमित पॉकेट में सिमट चुके हैं और उनका नेटवर्क लगभग ध्वस्त है। संयुक्त अभियान, कैंप विस्तार और विकास कार्य अंतिम चरण को स्थायी बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
सुंदरराज पी, आईजी, बस्तर
नक्सल विरोधी अभियान
हिंसा मुक्त बस्तर क्षेत्र करीब 95 प्रतिशत
2025 में मुठभेड़ों में मारे गए माओवादी 317
शीर्ष माओवादी नेता मारे गए 11
मुख्यधारा में लौटे माओवादी 1973
नए सुरक्षा कैंप 135
