Begin typing your search above and press return to search.

BASANT PANCHAMI IN Chattisgarh : छत्तीसगढ़ में बसंत पंचमी पर होली को लेकर निभाई जाती है खास परंपरा, आज नहीं हुई तो नहीं मन पाएगी होली

BASANT PANCHAMI IN Chattisgarh : होलिका दहन से 40 दिन पहले बसंत पंचमी के मौके पर छत्तीसगढ़ के गांव-गांव में अरंड पेड़ गाड़ने की परंपरा निभाई गई। जिस जगह पर अरंड पेड़ गाड़ा गया है, अब वहां पर लोग लकड़ियों को लाकर रखेंगे। वहा होलिका दहन होगी.

BASANT PANCHAMI IN Chattisgarh :  छत्तीसगढ़ में बसंत पंचमी पर होली को लेकर निभाई जाती है खास परंपरा, आज नहीं हुई तो नहीं मन पाएगी होली
X
By Meenu Tiwari

BASANT PANCHAMI IN Chattisgarh : बसंत पंचमी का छत्तीसगढ़ के लिए बहुत खास होता है। इस दिन से हमारी धरा में फाग महोत्सव की शुरुआत हो जाती है.


इस दिन मां सरस्वती की पूजा के साथ ही आज के दिन होलिका दहन का स्थान चयन कर उस जगह पर अरंड पेड़ गाडकर होलिका दहन की तैयारी शुरू की जाती है।




इस जगह पर इस दिन से गांव शहर के नागरिक लकड़ी और कंडे का दान करते हैं, और ऐसा करते हुए होलिका दहन तक वहां पूरी लकड़ी की व्यवस्था हो जाती है।


शहर के जाने माने पंडित महामाया मंदिर के पुजारी मनोज शुक्ला के अनुसर होलिका दहन से 40 दिन पहले बसंत पंचमी के मौके पर छत्तीसगढ़ के गांव-गांव में अरंड पेड़ गाड़ने की परंपरा निभाई गई। जिस जगह पर अरंड पेड़ गाड़ा गया है, अब वहां पर लोग लकड़ियों को लाकर रखेंगे। होली के एक दिन पहले होलिका दहन पर इन लकड़ियों का दहन किया जाएगा।




फाग महोत्सव की शुरुआत


बसंत पंचमी दिन से फाग के गीत गाने शुरू कर दिए जाते हैं। खासकर ब्रज क्षेत्र में बसंत पंचमी से होली की शुरुआत हो जाती है और ये उत्सव 40 दिन तक चलता है। हर दिन मंदिरों में भगवान को गुलाल अर्पित किए जाते हैं। बसंत ऋतु से प्रकृति अपने 12 रंगों को दिखाने लगती है और नई ऊर्जा का उत्सव मनाती है। यही कारण है कि इसी एक महीने तक प्रकृति के रंगों के साथ होली की तैयारी की जाती है। इसे प्रकृति का उत्सव भी कहा जाता है।


डाड़ गाड़ने की रस्म

मंदिर के पुजारी पं.मनोज शुक्ला ने बताया कि अंडा पेड़ गाड़ने की रस्म को डाड़ गाड़ना कहते हैं। बसंत पंचमी से होली पर्व की शुरुआत हो जाती है। अब होलिका दहन के लिए इसी स्थान पर लकड़ियां एकत्रित की जाएगी।

तालाब के किनारे जंगल झाड़ी में अरंडी पेड़ अपने आप उगता है, इसे खरपतवार की श्रेणी का पेड़ माना जाता है। इसे ग्रामीण इलाकाें में अंडा पेड़ कहा जाता है। इसे जलाने से जो धुआं निकलता है, उससे कीटाणुओं का खात्मा होता है। गांवों में जब मच्छरों का प्रकाेप फैलता है, तब मच्छरों का खात्मा करने के लिए अंडा पेड़ जलाया जाता है। मच्छर, कीड़े-मकौड़े खत्म होने से बीमारियों पर नियंत्रण रहता है।

Next Story