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याचिकर्ता पर जुर्माना: सुकमा में 13 साल पहले हुई 17 मौतों पर पुलिस के खिलाफ याचिका पेश करने वाले हिमांशु कुमार पर सुप्रीम कोर्ट ने किया 5 लाख जुर्माना

याचिकर्ता पर जुर्माना: सुकमा में 13 साल पहले हुई 17 मौतों पर पुलिस के खिलाफ याचिका पेश करने वाले हिमांशु कुमार पर सुप्रीम कोर्ट ने किया 5 लाख जुर्माना
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By NPG News

नई दिल्ली 14 जुलाई 2022। सुकमा के गोमपाड़ गांव में 2009 में तीन अलग अलग घटनाओ में 17 आदिवासियों की मौत को पुलिस बर्बरता बता सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करने वाले प्रसिद्ध आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता हिमांशु कुमार पर सुप्रीम कोर्ट ने 5 लाख जुर्माना किया है। साथ ही उनकी याचिका खारिज करते हुए कोर्ट ने उन पर केस चलाने की झूठ भी सरकार को दी है। उन्हें 4 हफ़्तों में जुर्माने की रकम अदा करनी होगी।

सुकमा जिले के गोमपाड़ा गांव में 2009 में तीन अलग अलग घटनाओ में 17 आदिवासियों की मौत हुई थी। एक डेढ़ साल के बच्चे की कटी उंगलियों वाली लाश भी मिली थी। जिसे पुलिस बर्बरता बता प्रसिद्ध आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता हिमांशु कुमार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। हिमांशु कुमार लंबे समय से बस्तर के अलग अलग हिस्सों से पुलिस कार्यवाहियों पर आवाज बुलंद करते रहे हैं। याचिका में उनके अलावा 12 अन्य नाम भी थे। याचिका में घटना की जांच एनआईए या सीबीआई से करवाने की मांग की गई थी। हिमांशु कुमार ने 12 अन्य याचिकाकर्ताओ के बयान अपने तरफ से रिकार्ड किये थे,जिनके आधार पर यह याचिका लगाई गई थी।

याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने तीस हजारी अदालत के जिला जज जीपी मित्तल को फरवरी 2010 में 12 अन्य याचिकाकर्ताओं के बयानों की वीडियोग्राफी करवाने के निर्देश दिये थे। साथ ही सभी को अदालत ने सुरक्षा प्रदान करवाई थी। 19 मार्च 2010 को जिला जज जीपी मित्तल ने अपनी जांच रिपोर्ट अदालत को सौपी थी। जिसके बाद यह मामला पेंडिंग था।

इस वर्ष केंद्र सरकार ने एक रिपोर्ट अदालत में पेश करते हुए कहा था कि जिला जज की जांच रिपोर्ट से एक रिपोर्ट कार्ड मिसिंग थी जो अब मिल गई है। मामले की सुनवाई कर सुप्रीम कोर्ट ने 19 मई को फैसला सुरक्षित रख लिया था। जिसे आज सुनाया गया।

सुनवाई के दौरान जो बात निकल कर सामने आई कि जिन 12 याचिकाकर्ताओ के बयान के आधार पर याचिका दाखिल की गई थी उन्होंने जिला जज को दिये गए अपने सार्वजनिक बयान में यह कहा था कि कुछ अज्ञात लोगों ने जंगलों से आकर ग्रामीणों की हत्या की है। साथ ही पुलिस या सुरक्षाबलो द्वारा हत्या से वह मुकर गए थे। रिपोर्ट के अनुसार अशिक्षित आदिवासियों को बहला-फुसलाकर या उन पर दबाव बना कर उनकी तरफ से सुप्रीम कोर्ट में झूठी याचिका दाखिल की गई थी. माओवादियों की तरफ से की जा रही गतिविधियों पर पर्दा ढकने की नियत से सुरक्षा बलों के खिलाफ कहानी गढ़ी गई. मुख्य याचिकाकर्ता हिमांशु कुमार ने सुप्रीम कोर्ट को भी गुमराह किया. केंद्र ने इस बारे में हिमांशु पर मुकदमा चलाने की अनुमति मांगी

मामले की सुनवाई जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस जेएम पारदीवाला की डिविजन बेंच में सुनवाई हुई। जिसमें सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि नक्सलियों के कृत्य को सुरक्षाबलों द्वारा अंजाम दिया जाना बता उनकी छवि खराब की जा रही है। केंद्र सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जनरल ने एक आवेदन देकर मांग की कि झूठे साक्ष्य प्रस्तुत करने पर कार्यवाही की अनुमति अदालत दे। सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि यह साजिश अन्तर्राजीय हो सकती हैं अतः केंद्रीय एजेंसी को जांच की झूठ दी जाए।

जिस पर अदालत ने उनकी मांग को ठुकराते हुए कहा कि यह छतीसगढ़ सरकार पर छोड़ा जाता है कि वह चाहें तो झूठे आरोप लगाने के आरोप में 211 के तहत याचिकाकर्ता पर मुकदमा चलाये। इसके साथ ही साजिश रचने का मुकदमा भी यदि राज्य सरकार चाहें तो चला सकती है। यह आदेश देते हुए चार सप्ताह में याचिकाकर्ता हिमांशु कुमार को सुप्रीम कोर्ट कानून सेवा समिति के पास जमा करने का आदेश दिया है।

याचिकाकर्ता हिमांशु बोले 5 लाख क्या मेरे पास तो 5 हजार नही,मेरा जेल जाना तय है:-

जुलाई को 13 साल पुरानी इस बहुचर्चित याचिका का निर्णय आने से पूर्व न्यायिक प्रक्रिया के प्रति अपनी आस्था प्रकट करते हुए हिमांशु कुमार ने बुधवार को अपने फेसबुक पेज पर इसकी जानकारी साझा करते हुए लिखा था कि 'कल सुप्रीम कोर्ट का फैसला आएगा। 16 आदिवासियों का पुलिस ने कत्ल किया था। डेढ़ साल के बच्चे का हाथ काट दिया गया था। मामला छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के गोमपाड़ गांव का है। मैं और आदिवासियों के रिश्तेदार 2009 में सुप्रीम कोर्ट में इंसाफ मांगने आए थे। हमने 13 साल इंतजार किया। उम्मीद है कल इंसाफ मिलेगा।'

फिर फैसला खिलाफ में आने व जुर्माना होने पर फिर से हिमांशु ने लिखा कि मारे गए 16 आदिवासियों जिसमें एक डेढ़ साल के बच्चे का हाथ काट दिया गया था के लिए इंसाफ मांगने की वजह से आज सुप्रीम कोर्ट ने मेरे ऊपर 5 लाख का जुर्माना लगाया है। और छत्तीसगढ़ सरकार से कहा है कि वह मेरे खिलाफ धारा 211 के अधीन मुकदमा दायर करे। मेरे पास 5 लाख तो क्या 5 हजार रुपया भी नहीं है। मेरा जेल जाना तय है। अपराध यह कि इंसाफ क्यों मांगा। फिर अंत मे वो एक शायरी भी लिखते हैं

'जिस धज से कोई मकतल को गया वो शान सलामत रहती

इस जान की कोई बात नहीं यह जान तो आनी जानी है'।

जस्टिस खानविलकर ने ही खारिज की थी जाकिया जाफरी की याचिका:-

जिस जस्टिस खानविलकर की बेंच से यह आदेश आया है इन्होंने ही पिछले महीने गुजरात दंगों की दोबारा से जाँच करने की माँग करने वाली जाकिया जाफरी की याचिका को भी ख़ारिज किया था।न केवल ख़ारिज किया था, बल्कि सेम पैटर्न पर याचिका डालने वाली एक्टिविस्ट तीस्ता सीतलवाड़ के लिए कहा कि वे इस मुद्दे को अपने लिए भुना रही हैं और उन पर कार्रवाई हो, अगले ही दिन गुजरात सरकार ने उन्हें जेल में डाल दिया।

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