Ex DGP Of Chhattisgarh: पूर्व DGP गंभीर: छत्तीसगढ़ के सबसे रुतबेदार डीजीपी रहे विश्वरंजन वेंटिलेटर पर, स्थिति नाजुक, मेदांता में भर्ती
Ex DGP Of Chhattisgarh: छत्तीसगढ़ के पूर्व पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन की स्थिति बेहद नाजुक है। वे करीब महीने भर से मेदांता हॉस्पिटल में भर्ती हैं। उन्हें पहले भी कार्डियक प्राब्लम हो चुका था, जब वे छत्तीसगढ़ पुलिस हाउसिंग कारपोरेशन के चेयरमैन थे। विश्वरंजन छत्तीसगढ़ में अब तक के सबसे प्रभावशाली डीजीपी रहे।

Ex DGP Of Chhattisgarh: रायपुर। पूर्व डीजीपी विश्वरंजन को पिछले महीने पटना के मेदांता में भर्ती कराया गया था। उन्हें कार्डियक प्राब्लम हुआ था। अस्पताल से जारी रिपोर्ट के अनुसार उनकी स्थिति क्रीटिकल बनी हुई है। कुछ दिन पहले उन्हें वेंटिलेटर से हटा लिया गया था। मगर कल स्थिति फिर से खराब होने पर उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया है।
छत्तीसगढ़ के छठवें डीजीपी
विश्वरंजन छत्तीसगढ़ के छठवे पुलिस महानिदेशक बनाए गए थे। ओपी राठौर के असामायिक निधन के बाद तत्कालीर रमन सिंह सरकार ने 2007 में उन्हें छत्तीसगढ़ पुलिस का प्रमुख बनाया था। वे करीब चार साल डीजीपी रहे।
आईबी में पोस्टेड रहे
1973 बैच के आईपीएस अधिकारी विश्वरंजन को छत्तीसगढ़ सरकार ने डेपुटेशन से बुलाकर जुलाई 2007 में सूबे का डीजीपी बनाया था। मध्यप्रदेश के बंटवारे में विश्वरंजन को छत्तीसगढ़ कैडर मिला था, मगर 2007 के पहले वे कभी छत्तीसगढ़ नहीं आए थे। वे मध्यप्रदेश के समय से ही आईबी में प्रतिनियुक्ति पर पोस्टेड थे। वे एडिशनल डायरेक्टर तक पहुंच गए थे। मगर जब उनके जूनियर को आईबी का डायरेक्टर बना दिया गया तो उन्हें वहां रहना फिर संभव नहीं था।
हाई प्रोफाइल के डीजीपी
छत्तीसगढ़ सरकार के रणनीतिकारों ने उनसे बात कर छत्तीसगढ़ लौटने के लिए तैयार किया। चूकि विश्वरंजन को बात करके बुलाया गया था, सो उनका रुतबा गजब का रहा। विश्वरंजन छत्तीसगढ के अब तक के सबसे हाई प्रोफाइल के डीजीपी रहे। उस समय उनसे पांच बरस जूनियर पी0 जाय उम्मेन छत्तीसगढ़ के चीफ सिकरेट्री थे। आईएएस, आईपीएस में सबसे सीनियर होने के नाते विश्वरंजन का जलजला था। रमन सिंह सरकार में उनका इतना दबदबा था कि उनका कहा कोई काट नहीं सकता था। मंत्री लोगों को उनसे बात करने से पहले सोचना पड़ता था। तत्कालीन गृह मंत्री ननकीराम कंवर से हमेशा उनकी तनातनी चलती रही। गृह मंत्री मीडिया से लेकर सीएम तक उनकी शिकायतें करते रहे। नक्सली मामलों को लेकर कई बार पुलिस की अक्षमता पर भी उन्होंने बयान दिया था। मगर विश्वरंजन के सम्मान को लेकर सरकार काफी संजीदा थी। वे छत्तीसगढ़ के पहले डीजीपी होंगे, जिनका कारकेट चलता था। आगे पायलट गाड़ी, पीछे फॉलो वाहन। विश्वरंजन का ये रुआब था कि वे जिस रास्ते से निकल जाते थे, ट्रैफिक रोक दी जाती थी। किसी कार्यक्रम में गए तो उनके आगे-पीछे 10-20 जवान होते थे। कह सकते हैं कि उन्होंने छत्तीसगढ़ में डीजीपी के तौर पर फुल इन्ज्वाय किया।
चुनाव आयोग ने हटाया
2009 के लोकसभा चुनाव के दौरान रायपुर में चुनाव के संबंध में मीटिंग थी। इसमें डीजीपी को भी बुलाया गया था। अब विश्वरंजन जैसे आईपीएस जूनियर आईएएस, आईपीएस के साथ बैठे...इसमें गड़बड़ तो होना ही था। मीटिंग में तत्कालीन मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी से उनकी किसी बात पर नोकझोंक हो गई। अब सरकार के वे बेहद करीबी तो थे ही....केंद्र में उस समय यूपीए की सरकार थी। सो, सरकार की मदद का आरोप लगाते उन्हें हटा दिया गया। चुनाव आयोग ने छत्तीसगढ़ सरकार से तीन नामों को पेनल मंगा कर अनिल नवानी को डीजीपी अपाइंट कर दिया था। आचार संहिता हटने के बाद हालांकि सरकार ने फिर से उन्हें डीजीपी नियुक्त कर दिया था।
विदाई अच्छी नहीं
विश्वरंजन करीब पौने चार साल डीजीपी रहे। जुलाई 2007 से लेकर 13 जुलाई 2011 तक। बीच में लोकसभा चुनाव के समय दो महीने अनिल नवानी डीजी पुलिस रहे। विश्वरंजन ने जिस जलजले के साथ डीजीपी की पारी खेली, उनकी बिदाई उतने ही खराब रही। बेआबरु होकर बोल सकते हैं। साल 2011 आते-आते सरकार के साथ उनकी खटर-पटर शुरू हो गई थी। तब भी बातें अंदर ही रही। कभी सतह पर नहीं आई। सिवाय गृह मंत्री ननकी राम के बयानों के अलावे। मगर पता नहीं अंदरखाने में ऐसा क्या हुआ कि रमन सिंह को बड़ा और आश्चर्यजनक फैसला लेने पर विवश कर दिया। 13 जुलाई 2011 को वे बेटी से मिलने अहमदाबाद जा रहे थे। यहां से सुबह दिल्ली गए और वहां से फिर करीब तीन बजे अहमदाबाज एयरपोर्ट पर लैंड किए। फ्लाइट से निकलकर वे बैग लेने गए, उसी समय उनके मोबाइल फोन की घंटी बजी। फोन चीफ सिकरेट्री पी0 जाय उम्मेन का था। उन्होंने एक लाईन का सरकार का संदेश उन्हें दिया...आपकी जगह अनिल नवानी को छत्तीसगढ़ का नया डीजीपी बनाया गया है। समझा जा सकता है कि विश्वरंजन पर क्या गुजरी होगी। विश्वरंजन को होम गार्ड के डीजी के साथ पुलिस हाउसिंग कारपोरेशन का प्रमुख बनाया गया। सरकार के इस फैसले से पुलिस महकमा ही नहीं, पूरी ब्यूरोक्रेसी हिल गई थी।
