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Chhattisgarh Tarkash: CM विष्णुदेव के सारथी?

Chhattisgarh Tarkash: छत्तीसगढ़ की ब्यूरोक्रेसी और राजनीति पर केंद्रित वरिष्ठ पत्रकार संजय दीक्षित का निरंतर 15 बरसों से प्रकाशित लोकप्रिय साप्ताहिक स्तंभ तरकश

Chhattisgarh Tarkash: CM विष्णुदेव के सारथी?
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By Sanjay K Dixit

तरकश, 14 जनवरी 2024

संजय के. दीक्षित

CM विष्णुदेव के सारथी?

बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व ने छत्तीसगढ़ के मंत्रिमंडल गठन में एक प्रयोग किया है...विभिन्न वर्गों को इसमें प्रतिनिधित्व दिया गया है। कुछ पुराने हैं, तो कुछ नए भी। पहली बार दो डिप्टी सीएम भी। पुराने लोगों को याद होगा...मध्यप्रदेश के दौर में 90 के दशक में दिग्विजय सिंह के साथ दो डिप्टी सीएम बनाए गए थे...एमपी से सुभाष यादव और छत्तीसगढ़ से प्यारेलाल कंवर। इसके करीब 30 साल बाद कांग्रेस सरकार ने डिप्टी सीएम का फार्मूला अजमाया और टीएस सिंहदेव को उप मुख्यमंत्री बनाया गया। हालांकि, इसका रिजल्ट अच्छा नहीं रहा। पूरे समय खींचतान चलती रही। बहरहाल, विष्णुदेव कैबिनेट की खासियत यह है कि इसमें अनुभवी के साथ ही नए फ्रेश चेहरे भी हैं। बेशक, इनकी क्रियेटिव सोच का लाभ छत्तीसगढ़ को मिलेगा। मगर इसके साथ यह भी...सबको स्वयं अपनी सीमाओं का ध्यान रखना पड़ेगा। वरना, घर के भीतर से बर्तन गिरने की आवाजें बाहर आएंगी तो उसके संदेश अच्छे नहीं जाएंगे। पूर्व मुख्यमंत्री डॉ0 रमन सिंह के पास सौदान सिंह जैसे सारथी थे। उस समय उनके बारे में बड़ी चर्चाएं होती थी, सौदान भाई साब ने चाबुक चलाई तो कभी डंडा चलाया। सौदान सिंह की भूमिका उस समय इसलिए महत्वपूर्ण रही कि रमन का चाबुक और डंडा वाला स्वभाव नहीं था। शिवराज सिंह, बैजेंद्र कुमार, अमन सिंह...ये सभी 2010 के बाद फुल फर्म में आए। तब तक सौदान ही कृष्ण की भूमिका में रहे। रमन सिंह जैसे विष्णुदेव साय भी हैं। बीजेपी को लंबे समय तक क्रीज पर टिके रहने के लिए मोदीजी को एक सौदान सिंह भी नियुक्त करना होगा। वरना, मंत्रियों की महत्वकंक्षाएं बढ़ेंगी तो बीजेपी के साथ छत्तीसगढ़ का भी नुकसान होगा।

चूके तो चौहान कैसा

आईएएस को आज भी देश की सबसे प्रतिष्ठित सर्विस माना जाता है। आईटी और ईडी की छाया पड़ने से पहले तो उन्हें रहनूमा ही समझा जाता था...प्रमोशन से लेकर डीए आदि सब टाईम पर। मगर छत्तीसगढ़ में उनकी ग्रह दशा कुछ ज्यादा ही बिगड़ गया था। कर्मचारियों का डीए बढ़ता रहा और वे बेचारे आह भी नहीं भर पा रहे थे। यह पहला मौका था कि डीए के मामले मे ंहमेशा पीछे रहने वाले छत्तीसगढ़ के कर्मचारी ऑल इंडिया सर्विस वालों से आठ परसेंट आगे हो गए। हालांकि, ऐसा नहीं कि नौकरशाहों ने इसके लिए प्रयास नहीं किया। किसी जगह पर उन्होंने बात रखने की कोशिश की थी, मगर तल्खी से पूछ दिया गया...आईएएस को महंगाई भत्ते की क्या जरूरत? इसके बाद फिर किसकी मजाल...वे डीए का ड बोलना भूल गए। फिर भी ठहरे आईएएस। सबसे बड़ा कंपीटिशन क्लियर करके आए हैं...सो मौके का इंतजार था। विधानसभा इलेक्शन के दौरान उन्हें अवसर मिल भी गया। दरअसल, चुनाव के दौरान कर्मचारियों पर डोरे डालने के लिए सरकार ने चुनाव आयोग से डीए बढ़ाने का परमिशन मांगा था। जीएडी के अफसरों ने मौके का फायदा उठाते हुए कर्मचारियों के साथ ऑल इंडिया सर्विस को भी जोड़ दिया। अब आयोग भी कम थोड़े है...इजाजत दिया भी वोटिंग के बाद। तब आचार संहिता प्रभावशील था ही। जीएडी को किसी से पूछने की जरूरत नहीं थी। सो, चुनाव आयोग का हवाला देते हुए ऑल इंडिया सर्विस वालों के लिए डीए वृद्धि का आदेश निकाल दिया। सरकार ने जिन कर्मचारियों को लिए आयोग को लिखा था, वह कर्मचारी वर्ग ताकता रह गया, आज तक उनका आदेश नहीं निकला। ठीक भी है...ऑल इंडिया सर्विस के अफसर हैं...महंगा लाइफस्टाईल...महंगाई भत्ते में उन्हें आगे रहना ही चाहिए।

नाम VVIP पुलिस और...

वीवीआईपी जिले की पुलिस गजबे कर रही है...जशपुर जिले के सन्ना में एक फॉरेस्ट कर्मी दंपति की घर घुसकर विधायक के रिश्तेदार और उसके लोगों ने जमकर पिटाई कर डाली। मगर यह जानते हुए कि पीड़ित दंपति एक बेहद महत्वपूर्ण व्यक्ति के करीबी रिश्तेदार हैं...पहले एफआईआर दर्ज करने में हीलाहवाला करती रही और बाद में अपराध दर्ज हुआ भी तो जमानती। ये वही जशपुर पुलिस है, जो विधानसभा चुनाव के दौरान मामूली बात पर पार्टी प्रत्याशी विष्णुदेव साय के खिलाफ अपराध दर्ज करने में देर नहीं लगाई थी। वीवीआईपी जिले की पुलिस महत्वपूर्ण लोगों के रिश्तेदारों को भी न्याय नहीं दिला पाएगी तो फिर किसके लिए क्या करेगी...इस घटना से समझा जा सकता है। बहरहाल, जशपुर का मजबूत कंवर समाज इस घटना से काफी नाराज है।

मंत्री, सिकरेट्री की जोड़ी

सभी मंत्रियों को मन मुताबिक सिकरेट्री नहीं मिलते। सबसे बढ़ियां वालों को मुख्यमंत्री अपने सचिवालय और विभागों के लिए छांट लेते हैं। उनके बाद कोई मापदंड नहीं होता। सरकार जैसा चाहे, वैसा सिकरेट्री टिकाया जाता है। वैसे सिकरेट्री के मामले में दोनों डिप्टी सीएम की स्थिति ठीक है। अरुण साव के पास कमलप्रीत सिंह और बसव राजू हैं तो विजय शर्मा के पास एसीएस मनोज पिंगुआ और निहारिका बारिक। वित्त और आवास पर्यावरण मंत्री ओपी चौधरी चूकि खुद ब्यूरोक्रेसी से रहे हैं इसलिए आर, संगीता और अंकित आनंद को छांट लिया। बाकी दो मंत्री अपने सिकरेट्री से बहुत खुश नहीं हैं। इनमें से एक की लेडी सिकरेट्री हैं। लखनलाल देवांगन जरूर किस्मती रहे, उन्हें कोरबा कलेक्टर रहे मो0 कैसर हक मिल गए। कैसर कोरबा के काफी पॉपुलर कलेक्टर रहे, तब लखनलाल कटघोरा से विधायक थे। काफी लो प्रोफाइल के लखनलाल लोगों के विभिन्न कामों को लेकर कलेक्टर के पास अक्सर जाते रहते थे। अब लखनलाल मंत्री हैं और कैसर उनके सिकरेट्री।

ऐसे मंत्री भी...

बात मंत्री लखनलाल देवांगन की चली तो बता दें, विष्णुदेव साय कैबिनेट के वे संभवतः पहले मंत्री होंगे, जो रायपुर के सवा तीन लाख वाले मकान में रहते हैं। आप यह पढ़कर चौंकेंगे...मगर यह सच है कि राज्य निर्माण के समय कर्मचारियों के लिए बनाए गए कचना रेलवे क्रॉसिंग के बाद हाउसिंग बोर्ड के 600 वर्गफुट के दो कमरे वाले फ्लैट में वे रहते थे। बुकिंग के दौरान इसकी कीमत सवा लीन लाख रुपए थी। लखनलाल जब भी रायपुर आते, इसी फ्लैट में रुकते थे। मंत्री पद की शपथ के लिए जब उनका लाव लश्कर हाउसिंग बोर्ड के अपार्टमेंट पहुंचा तो आसपास के लोग भौंचक रह गए। शाम होते-होते वहां पुलिस की तैनाती करनी पड़ गई क्योंकि पास पड़ोस के लोग यह देखने पहुंचने लगे कि राज्य का मंत्री इतने छोटे से फ्लैट में कैसे रहता होगा। हालांकि, वे मेयर भी रहे हैं। मगर न तो उस समय उतना बजट होता था और न ही वे उस तरह के लूटपाट वाले नेता हैं...वरना कमाने वाले लहर गिनकर पैसे कमा लेते हैं।

7 और आईएएस

छत्तीसगढ़ को जल्द ही सात और आईएएस मिल जाएंगे। सीएम विष्णुदेव साय ने डीपीसी की फाइल को अनुमोदन दे दी है। चूकि ये फाइल अब बुलेट ट्रेन की रफ्तार से दौड़ रही है, इसलिए समझा जाता है कि अगले महीने के फर्स्ट वीक तक यूपीएससी में डीपीसी कॉल हो जाए। इस समय राप्रसे से आईएएस अवार्ड के सात पोस्ट खाली हैं। इनमें संतोष देवांगन और हीना नेताम पुराने बैच के छूटे हुए हैं। इन दोनों का केस अब क्लियर है, इसलिए इनका नाम लिस्ट में उपर होगा। इसके बाद 2008 बैच में सात अफसर हैं। अश्वनी देवांगन, रेणुका श्रीवास्तव, आशुतोष पाण्डेय, सौम्या चौरसिया, रीता यादव, लोकेश चंद्राकर, आरती वासनिक और प्रकाश सर्वे। इनमें से मेरिट कम सीनियरिटी के आधार पर पांच को आईएएस अवार्ड होगा। मेरिट याने सीआर क होना चाहिए। हालांकि, सीआर ख भी है तो भी यूपीएससी सूक्ष्म परीक्षण करती है कि कहीं किसी विद्धेष से किसी का सीआर खराब तो नहीं किया गया है।

रापुसे का दुर्भाग्य

राज्य प्रशासनिक सेवा वालों को तो दो साल ही लेट हुआ, पुलिस सेवा वाले तो किस्मत के मारे हैं। 2008 बैच के डिप्टी कलेक्टर आईएएस बनने जा रहे मगर पुलिस में अभी 98 बैच को आईपीएस अवार्ड नहीं हुआ है। इस बैच के प्रफुल्ल ठाकुर चार-पांच जिलों की कप्तानी करके कई साल से सीएम सिक्यूरिटी में हैं। इसके बाद भी नॉन आईपीएस बनकर बैठे हैं। दरअसल, पुलिस में दिक्कत यह है कि आईपीएस भिड़-भाड़कर अपना प्रमोशन करा लेते हैं मगर जिन रापुसे अधिकारियों से वे दिन रात काम कराते हैं, उन्हें कोई पूछता नहीं। इसकी एक बड़ी वजह सरकार में रापुसे की फील्डिंग नहीं सही नहीं है। पीएचक्यू का रोल भी इस मामले मे उनके प्रति बहुत अच्छा नहीं रहा। वरना, पुलिस सेवा वाले डिप्टी कलेक्टरों से प्रमोशन में एक दशक पीछे थोड़े होते।

अंत में दो सवाल आपसे

1. एक आईएएस का नाम बताएं, जिसे सरकार किसी की भी हो, पोस्टिंग हमेशा दमदार मिल जाती है?

2. एसपी और आईजी की वीसी में डीजीपी अशोक जुनेजा ने जिस तरह नशे पर कार्रवाइयों को लेकर तेवर दिखाया...क्या उससे पीएचक्यू में होने वाले बदलाव पर संशय नहीं गहराता?

Sanjay K Dixit

संजय के. दीक्षित: रायपुर इंजीनियरिंग कॉलेज से एमटेक करने के बाद पत्रकारिता को पेशा बनाया। भोपाल से एमजे। पिछले 30 साल में विभिन्न नेशनल और रीजनल पत्र पत्रिकाओं, न्यूज चैनल में रिपोर्टिंग के बाद पिछले 10 साल से NPG.News का संपादन, संचालन।

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