Chhattisgarh Tarkash 2026: शराब, अफीम और जिस्म का कारोबार
Chhattisgarh Tarkash 2026:छत्तीसगढ़ की ब्यूरोक्रेसी और राजनीति पर केंद्रित पत्रकार संजय के. दीक्षित का पिछले 17 बरसों से निरंतर प्रकाशित लोकप्रिय साप्ताहिक स्तंभ तरकश।

तरकश, 15 मार्च 2026
संजय के. दीक्षित
शराब, अफीम और जिस्म का कारोबार
हालांकि, दुर्ग के फार्म हाउस में अफीम कांड के बाद सरकार के निर्देश पर कलेक्टरों ने अपने जिलों के फार्म हाउसों की जांच-पड़ताल शुरू करा दी है। मगर यह भी सही है कि सूबे के फार्म हाउस तमाम धतकरमों के अड्डे बन गए हैं। छत्तीसगढ़ में करीब एक हजार से अधिक फार्म हाउस होंगे। आपको यह जानकर ताज्जुब होगा कि अधिकांश फार्म हाउस कृषि के नाम पर सरकार को लगान दे रहे और शराब, ड्रग और जिस्म के धंधे से लाखों, करोड़ों रुपए पीट रहे हैं। नियमानुसार फार्म हाउस के कुल रकबा के 10 परसेंट से अधिक निर्माण नहीं किया जा सकता। मगर शहर से लगे अधिकांश फार्म हाउसों में बड़ी संख्या में कमरे, हॉल, लॉन, स्वीमिंग पुल बना डाले हैं। शादियों की सीजन में शादी बाकी समय जमकर ऐय्याशी होती है। इन अड्डों पर जाने की न पुलिस हिमाकत कर पाती और न कोई सरकारी मुलाजिम। या तो उनका महीना बांध दिया जाता है या फिर किसी पॉलिटिशियन के नाम पर चमका दिया जाता है। जाहिर है, किसी नेता का नाम आ गया तो फिर छत्तीसगढ़ पुलिस की इतनी हिम्मत कहां? बहरहाल, सरकार का इससे राजस्व का बड़ा नुकसान हो रहा। कृषि जमीन के नाम पर लगान दे रहे कौड़ियों में और कमा रहे करोड़ों में।
अफसरों की हालत खराब
दुर्ग और बलरामपुर में अफीम की खेती पकड़े जाने के बाद छत्तीसगढ़ के आईएएस, आईपीएस के हालत खराब हुए जा रहे हैं। खासकर, रायपुर, दुर्ग, बेमेतरा, धमतरी, बिलासपुर, जांजगीर तक आईएएस अधिकारियों के फार्म हाउस हैं। एक कथित तौर पर साफ-सुथरी छबि वाले आईएएस अधिकारी जांजगीर कलेक्टर रहते शिवरीनारायण के पास 40 एकड़ जमीन खरीद डाली। उसे किसी किसान को अधिया में दिया है। अब वो किसान उसमें क्या उपजा रहा...अफसर को चिंता होगी ही। ऐसे न जाने कितने फार्म हाउस नौकरशाहों के हैं। अफीम कांड के बाद अफसर खुद ही जाकर अब अपने फार्म हाउस का मुआयना कर रहे हैं।
धान 20 रुपए, अफीम 50 हजार रुपए किलो?
अफीम का रेट जानकार आप चौंक जाएंगे। पहले ये आपको बता दें कि अफीम के तीन पार्ट होते हैं और तीनों बेशकीमती। अफीम के फल के छिलके से डोडा बनता है, वह 20 हजार रुपए किलो बिकता है। आमतौर पर ट्रक ड्राईवर इसे खाते हैं, इसमें ऐसा नशा होता है, जिसमें खुमारी तो होती है मगर नींद नहीं आती। दूसरा, अफीम के फल को सूखाकर खसखस बनाया जाता है, इसका रेट करीब 2000 रुपए किलो होता है। तीसरा, अफीम के फल में चीरा लगाकर उसका बूंद-बूंद टपकते दूध को एकत्र किया जाता है। इसे सूखाकर अफीम बनाया जाता है। इसकी कीमत करीब 50 हजार रुपए किलो है। और इस अफीम को प्यूरीफाई कर हेरोईन बनता है, जो बाजार में दो करोड़ रुपए किलो बिकता है। बहरहाल, आप अब समझ गए होंगे कि छत्तीसगढ़ को उड़ता पंजाब बनाने की कोशिश क्यों की जा रही है।
बीजेपी नेता पर पहली कार्रवाई
अफीम कांड में सरकार ने पहली बार कड़ा स्टैंड लिया। मुख्यमंत्री और गृह मंत्री दोनों ने दुर्ग पुलिस को फ्री हैंड दिया और बीजेपी नेता को सींखचों के पीछ्रे पहुंचा दिया गया। हालांकि, पुलिस पर प्रेशर कम नहीं था। संगठन से लेकर संघ से पुलिस के पास दनादन फोन आ रहे थे। मगर पुलिस एक न सुनी। अफीम के मसले पर विपक्ष भले ही सरकार को आड़े हाथ ले रहा, मगर बीजेपी नेता की गिरफ्तारी से सरकार ने कैडर को एक बड़ा संदेश दिया है। भाजपा की सेहत के लिए यह इसलिए भी जरूरी था कि कांग्रेस के पांच साल के शासन के बाद देखादेखी बीजेपी का कैडर भी निरंकुश हो गया है। सरकार बनने के बाद प्रदेश में ऐसे अनेक मामले आए, जिसमें बीजेपी के नेताओं ने कार्रवाई नहीं होने दी। हमारी सरकार...बोल पुलिस के हाथ कस दिए जाते हैं। कुछ विधायकों को भी आईना दिखाने की जरूरत है। उनके आचरण इतना बिगड़ गया है कि बीजेपी जैसी संस्कारित पार्टी से मेल नहीं खाता। भूमाफिया की तरह जमीन कब्जाने और गुंडे पालने जैसे काम भी हो रहे हैं। चलिये सरकार ने दमदारी दिखाई है, इससे निश्चित तौर पर बेलगाम कार्यकर्ताओं को विधायकों पर असर पड़ेगा।
कलेक्टरों की आंखों पर पट्टी?
दुर्ग और बलरामपुर जिले में अफीम की खेती का भंडाफोड़ हुआ है, वह राजस्व सिस्टम का फेल्योरनेस है। इन जिलों के पटवारी अगर गिरदावरी रिपोर्ट से पहले अगर मौके पर पहुंच का खेतों का जायजा लिया होता तो सरकार को बगले झांकना नहीं पड़ता। दरअसल, पटवारियों की ये समस्या सिर्फ दुर्ग और बलरामपुर का नहीं, अमूमन सभी जिलों का कमोवेश यही हाल है। पटवारी खुद से वेतन देकर दो-दो, तीन-तीन एजेंट रख लेते हैं और एजेंट जो बोलते हैं, पटवारी सील-ठप्पा लगाकर उसे कलेक्टर को सौंप देते हैं। कायदे से कलेक्टरों को पटवारियों को टाईट करना चाहिए क्योंकि पटवारियों के नियोक्ता कलेक्टर होते हैं। मगर कलेक्टर आंखों पर पट्टी बांध लेंगे तो फिर वही होगा, जो इस समय हो रहा है। चीफ सिकरेट्री और पीएस टू सीएम ने वर्किंग कल्चर के लिए बायोमेट्रिक अटेंडेंस और ई-ऑफिस चालू कर दिया मगर पटवारी राज के खात्मे के लिए भी कोई आईडिया निकालना चाहिए।
कलेक्टरेट और बीजेपी का गड्ढा
अविभाजित जांजगीर जिला यानी जांजगीर और सक्ती छत्तीसगढ़ बीजेपी का सबसे बड़ा गड्ढा है। वहां पार्टी को एक अदद सीट नसीब नहीं हुई। इन जिलों के रेवेन्यू अफसर पार्टी की और खटिया खड़ी करने में लगे हैं। सक्ती में आदिवासियों की जमीन भूमाफियाओं को दो-दो मामला होने के बाद भी बड़े प्रशासनिक अफसरों पर कार्रवाई नहीं होने पर उससे जांजगीर जिले के अफसरों का भी हौसला बढ़ गया। नैला स्टेशन की साइडिंग के ठीक सामने एक कोयला कारोबारी को एसडीएम ने कोटवारी जमीन का डायवर्सन कर दिया। पटवारी ने अपने रिपोर्ट में ये भी नहीं बताया कि कोयला कारोबारी की जमीन तक पहुंचने के लिए कोई रास्ता नहीं है। मौके के पास ढाई एकड़ का तालाब है और पास में बस्ती भी। मगर जांजगीर कलेक्ट्रेट के अफसरों के लिए सबसे बड़ा रुपैया है। आसपास के लोगों और सरपंचों की शिकायत और नाराजगी को अनसूनी करते हुए कोल कारोबारी को कोटवारी भूमि का नामंतरण कर दिया गया। दरअसल, खटराल अफसरों का हौसला इसलिए बढ़ रहा कि कार्रवाइयों के मामलों में सिस्टम ज्यादा संवेदनशील हो जाता है। जब मालूम है कि जांजगीर इलाका सत्ताधारी पार्टी के लिए मुफीद नहीं तो ऐसे में अफसरों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। मगर एप्रोच कोटे में गए जिला प्रशासन के अफसरों का क्या? मालूम है, कलेक्ट्रेट में आखिरी पोस्टिंग है, इसलिए सरकार और सत्ताधारी पार्टी की सेहत से उन्हें क्या वास्ता?
मंत्रिमंडल की सर्जरी
इस खबर में कितनी सत्यता है, ये तो वक्त बताएगा...बीजेपी के अंदरखाने में ये चर्चा बड़ी तेज है कि मई में मंत्रिमंडल की बड़ी सर्जरी हो सकती है। उसमें मुख्यमंत्री को छोड़ सभी 12 मंत्रियों के इस्तीफे ले लिए जाएंगे। फिर नए सिरे से मंत्रिमंडल का गठन किया जाएगा और विभागों का बंटवारा भी। जाहिर सी बात है, और बीजेपी के लोग भी स्वीकार करते हैं कि विष्णुदेव की इस टीम से तो 2028 में पार्टी की नैया पार नहीं लग पाएगी। खबरों की माने तो 12 में से चार-से-पांच मंत्रियों की छुट्टी होगी। इनमें से कुछ ऐसे मंत्री भी शामिल हैं, जो रमन सिंह की टीम में काम कर चुके हैं मगर इस समय मैदान में खेलने की बजाए पेवेलियन में बैठ सिर्फ ताली बजा रहे हैं। कई मंत्रियों के विभाग भी बदलेंगे तो कुछ का लोड भी हल्का किया जाएगा। मई में सर्जरी की चर्चा इसलिए हो रही कि तब तक सरकार का ढाई साल हो जाएगा। यानी इंटरवल। इसके बाद सिस्टम के पास काम करने के लिए सिर्फ डेढ़ साल बचेंगे। क्योंकि, चुनावी साल में कोई काम होता नहीं। 2028 में जनवरी से ही सरकारें इलेक्शन मोड में आ जाती हैं। अगर मई में मंत्रिपरिषद की रिसफल हो गया फिर तो कई मंत्रियों के लिए यह आखिरी विधानसभा का सत्र होगा। क्योंकि, मानसून सत्र अब जुलाई में आहूत होगा। रही बात किस मंत्री की विदाई होगी तो बीजेपी की राजनीति में कोई दावे के साथ कुछ कह नहीं सकता। आखिर भला कौन जानता था कि धमेंद्र प्रधान पछाड़ खा जाएंगे और नितिन नबीन का नाम राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए सामने आ जाएगा। और बात नितिन नबीन की आई तो छत्तीसगढ़ के बारे में उनसे भला क्या छिपा हुआ है। कैडर के साथ उनका कनेक्शन इतना जबर्दस्त है कि पार्षद और उसके नीचे लेवल के बीजेपी कार्यकर्ता भी उनसे सीधे जुड़े हुए हैं। कहने का आशय यह है कि कौन मंत्री किस लेवल पर गुल खिला रहा, नितिन नबीन के पास पूरा अपडेट है। इसलिए जो भी होगा चौंकाने वाला होगा।
होली में गुलजार
होली के अगले दिन किसी भी स्टेट में छुट्टी नहीं रहती। मगर छत्तीसगढ़ में दशकों से यह परंपरा चली आ रही थी कि ऑफिस का दरवाजा तो खुलता था, मगर कोई स्टाफ नहीं पहुंचत था। भृत्यों के नहीं आने पर कई ऑफिसों के ताले भी नहीं खुलते थे। मगर राज्य सरकार ने बायोमेट्रिक अटेंडेंस का ऐसा सिस्टम लगाया कि होली के दूसरो दिन ऑफिस गुलजार रहे। मंत्रालय छोड़ बाकी जगहों पर भले ही कोई खास कामकाज नहीं हुआ होगा मगर उपस्थिति बराबर रही। वर्किंग कल्चर की दिशा में सरकार की यह बड़ी सफलता रही।
सिकेट्री से मिलना कठिन नहीं
आम आदमी के लिए पहले मंत्रालय में बड़े अफसरों से मिलना बड़ा कठिन टास्क होता था। एक तो पूरे हफ्ते अफसर आते नहीं थे और आए भी दोपहर को और अपरान्ह होते ही जाने की तैयारी। जिसकी मीटिंग होती थी, वहीं टाईम पर आता और जाता था। वरना, तो राम-राम। मगर जब से बायोमेट्रिक अटेंडेंस हुआ है, मंत्रालय में साढ़े 10 बजे तक 90 परसेंट अफसर पहुंच जाते हैं। फिर साढ़े पांच बजे से पहले हिलना नहीं है। उपर से अब पुराने विधानसभा का बहाना भी नहीं। बगल में विधानसभा है। नहीं तो विधानसभा सत्रों के दौरान तो अफसरों के मौज होते थे। मगर अब आदमी दिन भर बैठेगा तो कुछ-न-कुछ काम करबे करेगा। अब तो कई अधिकारियों ने अपने पीए को कह दिया है, जिसको भी मिलना हो, भेजते जाओ। अभी की स्थिति यह है कि दो-तीन परसेंट अति अभिमानी अफसरों को छोड़ दें तो लगभग सभी काम में लग गए हैं, लोगों से मिलजुल भी रहे हैं।
पीए, स्टेनो बेरोजगार
एक वो भी जमाना था, जब बड़े अफसरों के पीए, स्टेनो बनने के लिए कर्मचारी लालायित रहते थे। मगर सरकार ने ई-ऑफिस शुरू कर पीए और स्टेनों के पेट पर बड़ी चोट कर डाली। पहले जितने कद्दावर अफसर होते थे, उनके पीए का उतना ही जलवा होता था। फाइलों की जानकारी देना या उसे आगे बढ़ाना...किस फाइल को दबाना है और किस फाइल को वंदे भारत एक्सप्रेस की तरह दौड़ाना, सबकी कीमत तय थी। मगर ई-ऑफिस ने ऐसा बेड़ा गर्क किया कि अब प्रति फाइल के पीछे नजराना मिलना तो छोड़िये होली-दिवाली में गिफ्ट मिलना मुश्किल हो जाएगा। क्योंकि, फाइलें अब सीधे अफसरों के पास पहुंच जा रही। वर्तमान सिस्टम में सिर्फ जो बाबू नोटशीट बढ़ाता है, उसे सिर्फ इतना पता रहता है कि फलां फाइल किस अफसर के पास है, मगर उसमें नोटिंग क्या है, इस बारे में वह कुछ नहीं बता सकता। कुल मिलाकर कहा जाए तो पीए और स्टेनो का काम अब साहब के लिए मीटिंग का फोल्डर बनाना, चाय-नाश्ते का इंतजाम करना और पब्लिक से मिलवाना बच गया है।
नौकरशाहों में खलबली
बीजेपी लीगल सेल के अ-संतुष्ट नेता ने चीफ सेकेट्री विकास शील से 27 पन्नों की ऐसी गंभीर शिकायत की है कि नौकरशाही हिल गई है। कंप्लेन में दो पूर्व मुख्य सचिव समेत कई अफसरों के नाम हैं। असल में, ब्यूरोक्रेसी भी अपनी अड़ी में रहती है, वरना PSC में मेंबर के दो पद खाली हैं, तीसरा खाली होने वाला है। नीति आयोग में भी मेम्बर की एक वैकेंसी है। सरकार को बोल-बालकर नेताजी को एडजस्ट कराना चाहिए। वरना, दिक्कतें बढ़ती जाएंगी।
आईएएस को अभयदान!
पटवारी से आरआई प्रमोशन स्कैम में एसीबी ने कई लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। मगर चालान में इस घोटाले का मास्टरमाइंड तक एसीबी पहुंचने की कोशिश नहीं की। हालांकि, एक एसीबी ने एक आईएएस से पूछताछ के लिए जीएडी से अनुमति मांगी थी। अनुमति मिली कि नहीं, इस पर कोई मुंह खोलने तैयार नहीं। हालांकि, 1300 पेज के चालान में एसीबी ने इस बात का जिक्र अवश्य किया है कि अतिविशिष्ट लोगों के यहां पर्चा सेट हुआ और उत्तरपुस्तिकाएं तैयार की गई। मगर मिलियन डॉलर का सवाल यह है कि एसीबी के हाथ आईएएस तक क्यों नहीं पहुंच पाए।
अजब संयोग
रिटायर आईएएस गणेश शंकर मिश्रा को राज्य सरकार ने नीति आयोग का उपाध्यक्ष अपाइंट किया है। नौकरी से रिटायरमेंट के बाद गणेश शंकर ने जब बीजेपी ज्वाईन किया था, तब विष्णुदेव साय पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष थे। इस नाते उन्होंने ही गणेश शंकर को पार्टी में प्रवेश कराया था। अब जब पार्टी में प्रवेश कराने वाले ही राज्य सरकार के मुखिया बन गए तो फिर इतना तो बनता ही था कि गणेश शंकर को सम्मानजनक कुर्सी मिल जाए। विष्णुदेव साय ने गणेश शंकर को उस आयोग का उपाध्यक्ष बनाया, जिसके वे खुद अध्यक्ष हैं। यही नहीं, उनकी ताजपोशी के समय खुद मौजूद रहे। चलिये, ये सब वक्त और संयोग की बात है। गणेश शंकर पूर्व मुख्यमंत्री डॉ0 रमन सिंह के काफी नजदीक रहे। मगर रिटायरमेंट के बाद 2017 में उन्हें अल्पज्ञात सहकारिता निर्वाचन का कमिश्नर बनाया गया था। मगर अब जो कुर्सी मिली है, वह चीफ सिकरेट्री के समकक्ष है। उनसे पहले जितने भी लोग नीति आयोग के उपाध्यक्ष बने हैं, वे या तो चीफ सिकरेट्री रहे हैं या फिर एक्स चीफ सिकरेट्री। हालांकि, गणेश शंकर की नियुक्ति के बाद जिन लोगों ने विष्णुदेव साय के हाथों उनके पार्टी अध्यक्ष रहते बीजेपी ज्वाईन किया होगा, उनकी उम्मीदें बढ़ गई होंगी।
अच्छी खबर
छत्तीसगढ़ के लिए अच्छी खबर है, राज्य बनने के 25 साल बाद रायपुर मेडिकल कॉलेज में DM की पढ़ाई होगी। NMC ने अम्बेडकर हॉस्पिटल के एडवांस कार्डियक इंस्टिट्यूट को 2 सीट की हरी झंडी दे दी है। मध्यप्रदेश के भोपाल और इंदौर मेडिकल कॉलेज में DM की पढ़ाई होती है। मगर छत्तीसगढ़ में चना-मुर्रा की तरह कॉलेज खुलते गए मगर क़्वालिटी एजुकेशन न होने से NMC ने DM कोर्स की मंजूरी नहीं दी। ACI के हेड डॉ. स्मित श्रीवास्तव को इसका क्रेडिट जाना चाहिए, वे दो साल से लगातार इसके लिए प्रयासरत थे। ACI को स्थापित करने में उन्हीं का एफर्ट रहा है।
आखिरी बात हौले से
1835 में जन्मे अमेरिका के महान लेखक और हास्य कलाकार सैम्यूअल लैंघोर्न क्लेमेन्स उर्फ मार्क ट्वेन 150 साल पहले कहा था...राजनीति मात्र ऐसा पेशा है, जहां चोरी कर सकते हैं, झूठ बोल सकते हैं, घोखा दे सकते हैं, फिर भी सम्मानित हो सकते हैं।
अंत में दो सवाल आपसे?
1. स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव और पाठ्य पुस्तक निगम के अध्यक्ष राजा पांडेय के बीच कितने दिनों से बात नहीं हुई है?
2. छत्तीसगढ़ में किन-किन मंत्रियों की मंत्रिमंडल से विदाई हो सकती है?
