Chhattisgarh Tarkash 2026: छत्तीसगढ़ में रिसोर्ट माफिया

तरकश, 31 मई 2026
संजय के. दीक्षित
छत्तीसगढ़ में रिसोर्ट माफिया
20 मई को राजनांदगांव के डिस्ट्रिक्ट एडमिनिस्ट्रेशन ने मनगटा जंगल सफारी के पास 150 एकड़ में बन रहे निर्माणाधीन रिसोर्टों को बुलडोजर चलाकर तोड़ दिया। मगर, इससे भी बड़ा न्यूज ये है कि इस कार्रवाई से भूमाफियाओं, अफसरों और नेताओं का ऐसा नेक्सस उजागर हुआ, जो लंबे समय से रिसोर्टों में अपनी काली कमाई को निवेश कर रहा था। आपको ये जानकार हैरानी होगी कि राजनांदगांव देश का शायद पहला जिला होगा, जहां एक किमी के सराउंडिंग 190 रिसोर्ट हैं और सभी चालू हालत में। इसके अलावा 130 निर्माणाधीन। अधिकांश रिसोटर््स बेजा कब्जा, या फिर रेरा के नियमों को ताक पर रख बना डाले। सफेदपोशों ने वहां ऐसा फुलप्रूफ सिस्टम बना लिया था कि कोई छोटा मुलाजिम उधर देख नहीं सकता था, और बड़ों को मुंहमांगी कीमत मिल जाती थी या फिर जंगल में मंगल मनाने का मौका। उपर से एक रिसोर्ट भी टिका दिया जाता था। टिकाने का मतलब ये कि रिसोर्ट माफिया पहुंच जाते थे...साहेब, आप एक रिसोर्ट ले लीजिए, आपको सस्ते में मिल जाएगा, आप इंवेस्ट कर दो, बाकी रिसोर्ट हम चला लेंगे, आपको किराया मिलता रहेगा और मूल संपत्ति भी बनी रहेगी। तभी 20 मई को जब जिला प्रशासन का डंडा चला तो छत्तीसगढ़ ही नहीं, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र तक हिल गया। जाहिर है, ये दोनों राजनांदगांव से लगे पड़ोसी राज्य हैं। छत्तीसगढ़ के ब्यूरोक्रेट्स, नेताओं और भूमाफियाओं के साथ एमपी और महाराष्ट्र के भी कई अफसरों और नेताओं के वहां रिसोर्ट हैं। सभी जगहों से फोन घनघनाने लगे। सबको एक ही डर सता रहा था, मेरा वाला तो बच जाएगा न। जिला प्रशासन के अफसरों पर कम प्रेशर नहीं आया। बड़े स्तर पर, बड़ी मात्रा में खुशामद करने के प्रयास हुए। मगर सब धान बाइस पसेरी नहीं होते। कलेक्टर जीतेन्द्र यादव झुके नहीं।
ऐय्याशी का अड्डा
आपके मन में सहसा यह प्रश्न उठेगा कि राजनांदगांव जिले में ऐसा क्या है कि एक जगह पर सैकड़ों रिसोर्ट बन गए। तो पहले उस जगह की थोड़ी ज्योग्राफी बता देते हैं। राजनांदगांव जिला मुख्यालय से सिर्फ 19 किमी दूरी पर मनगटा जंगल सफारी है। और उसी के पास ये रिसोर्ट बने हैं। मनगटा सफारी आम लोगों में बहुत प्रचलित नहीं है। इसलिए आम आदमी कम ही जाता है। इसलिए, रायपुर से लेकर भिलाई, दुर्ग, राजनांदगांव और एमपी, महाराष्ट्रा के सफेदपोशों, अफसरों और नेताओं के लिए मौज-मस्ती और ऐय्याशी का सुरक्षित केंद्र बन गया है। रायपुर तक के अफसर वीकेंड में मनगटा पहुंच जाते हैं। कई जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के बारे में ये भी पता चला है कि घर में बोलकर जाते हैं, वे मीटिंग में दिल्ली जा रहे मगर उनकी गाड़ी घूम जाती है...मनगटा के रिसोर्ट की ओर। बड़े लोगों के संरक्षण का ही नतीजा है कि भिलाई-दुर्ग और रायपुर के भूमाफियाओं ने मनगटा के 54 एकड़ सरकारी जमीन पर भी रिसोर्ट का निर्माण प्रारंभ कर दिया था। वो गनीमत रहा कि जिला प्रशासन की नजर में आ गया। और ढांचा धराशायी हो गया।
दामाद बाबू कामयाब
94 बैच के आईएफएस अरुण पाण्डेय हेड ऑफ फॉरेस्ट बनने में कामयाब हो गए। सरकार ने उन्हें दो सीनियर अफसरों को सुपरसीड कर वन बल प्रमुख बनाया है। जाहिर है, कौशलेंद्र कुमार और अनिल साहू उनसे वरिष्ठ थे। अलबत्ता, इस मुकाम तक पहुंचने में अरुण पाण्डेय की राह आसान नहीं रही। उनके विरोधियों ने चुटिया बांध ली थी। सरकार को गलत सूचना देकर 7 मई को हॉफ की डीपीसी रुकवा दी गई कि ओपी यादव का नाम शामिल नहीं किया गया है। जबकि, ओपी लेवल 15 में हैं, लिहाजा वे एलिजिलबल नहीं थे। मगर सरगुजा वाले पाण्डेयजी कमजोर थोड़े ही हैं। लंबे समय तक जशपुर के डीएफओ रहे हैं। सरकार ने भी बड़ा मैसेज देने के लिए श्रीनिवास राव के रिटायर होने के चार दिन पहले नए हेड ऑफ फॉरेस्ट का आदेश निकाल दिया। छत्तीसगढ़ के इतिहास में सीएस, डीजीपी और हॉफ का आदेश इतना जल्दी नहीं निकला। आमतौर पर एक दिन पहले या रिटायरमेंट के दिन ही आर्डर होते थे। मगर इस बार का मामला जुदा रहा। बहरहाल, अरुण 13 महीने याने जून 2027 तक इस पद पर रहेंगे। बता दें, उनके ससुर वासुदेव दुबे छत्तीसगढ़ में आईपीएस अधिकारी रहे। लंबे समय तक वे डीजी जेल रहे मगर डीजी पुलिस नहीं बन पाए। रमन सिंह सरकार की पहली पारी में उन्हें सुपरसीड कर ओपी राठौर और विश्वरंजन को डीजीपी बनाया गया था। चलिए, ससुर न सही...दामाद बाबू स्टेट के टॉप थ्री पोस्ट में पहुंच गए हैं।
हॉफ के पावर
अबकी पहला दफा हुआ कि हेड ऑफ फॉरेस्ट की नियुक्ति को लेकर मीडिया में खूब खबरें चली। कुछ चली, कुछ चलवाई गई। इस पोस्ट की टीआरपी बढ़ी तो उसके बारे में जानना भी चाहिए। स्टेट में 225000 के सुपरस्केल वाले गिने-चुने पद होते हैं। चीफ सिकरेट्री, एसीएस, डीजीपी और हेड ऑफ फॉरेस्ट याने हॉफ। इनमें सीएस और डीजीपी का जलवा जरूर रहता है। मगर फायनेंसियल पावर में हॉफ का कोई मुकाबला नहीं। फॉरेस्ट एक्ट में सारा बजट वन मुख्यालय को ट्रांसफर हो जाता है। लगभग 23-24 हजार करोड़ के वन विभाग के बजट के कुबेर होते हैं हॉफ। हालांकि, वन मंत्री अगर तेज हैं तो फिर हॉफ का प्रभाव थोड़ा प्रभावित होता है। फिर भी हेड ऑफ फॉरेस्ट का वन विभाग में रुतबा रहता है। किस डिवीजन और सर्किल को कितना बजट मिलना है, ये हॉफ तय करते हैं। ट्रांसफर, पोस्टिंग में भी हॉफ की राय अहमियत रखती है...इसमें वे कम-से-कम 20 फीसदी अपनी चला ही लेते हैं।
आईपीएस पत्नी के सितारे
नवनियुक्त हेड ऑफ फॉरेस्ट अरुण पाण्डेय अगले साल जून में रिटायर हो जाएंगे। इसके बाद इस पद के लिए सबसे मजबूत दावेदार कोई है तो वो हैं संजीता गुप्ता। संजीता 95 बैच की आईएफएस अधिकारी हैं। उन्हें इसलिए वन बल प्रमुख बनना तय माना जा रहा, क्योंकि, तब कोई कंपीटिटर नहीं रहेगा। संजीता का कार्यकाल भी काफी लंबा होगा। 2031 में उनका रिटायरमेंट है। याने लगभग चार साल। संजीता सीनियर आईपीएस हिमांशु गुप्ता की पत्नी हैं। यूपीएससी द्वारा डीजीपी के लिए बनाए गए पेनल में अरुणदेव गौतम के साथ हिमांशु गुप्ता का भी नाम था। मगर ग्रह-नक्षत्र ने उनका साथ नहीं दिया। सरकार ने काफी आगे-पीछे होने के बाद अरुणदेव गौतम के नाम पर मुहर लगा दी। बहरहाल, हिमांशु गुप्ता की पत्नी संजीता के साथ ऐसा नहीं होगा। निश्चित तौर पर छत्तीसगढ़ की वे पहली हेड ऑफ फॉरेस्ट बनेंगी। दरअसल, इस महीने श्रीनिवास राव और तपेश झा और जुलाई में अनिल साहू और प्रेम कुमार के रिटायर होने के बाद पूरा मैदान खाली हो जाएगा। ओपी यादव अगले साल फरवरी में, उसके बाद अमरनाथ भी रिटायर हो जाएंगे। जिस तरह आईएएस में प्रमुख सचिव लेवल पर बड़ा वैक्यूम है, उसी तरह आईएफएस में पीसीसीएफ स्तर पर कई साल तक यही स्थिति रहनी है।
ब्यूरोक्रेसी का दिमाग
उपर में पे-स्केल लेवल 17 का जिक्र हुआ तो फिर ब्यूरोक्रेसी के ब्रेन की चर्चा लाजिमी है। दरअसल, स्टेट में शीर्ष स्केल के पद तीन ही होते थे। मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक और हेड ऑफ फॉरेस्ट। तब 80 हजार के स्केल होते थे। मगर दिल्ली में बैठी ब्यूरोक्रेसी ने चकरी चला दी। आईएएस में प्रमुख सचिव के बाद एसीएस प्रमोट होते ही लेवल 17 का वेतनमान फिक्स कर दिया। याने चीफ सिकरेट्री के समकक्ष एडिशनल चीफ सिकरेट्री का वेतन। मगर पुलिस और वन विभाग में डंडी मार दी। पुलिस में एडीजी से डीजीपी एक ग्रेड उपर होते हैं तो वन विभाग में पीसीसीएफ और हेड ऑफ फॉरेस्ट में भी इसी तरह का अंतर। अर्थात पुलिस और वन महकमे में लेवल 17 के एक-एक पद होते हैं लेकिन ब्यूरोक्रेसी में सीएस के साथ सभी एसीएस भी।
पूर्व CS और हमारी चूक
पिछले तरकश स्तंभ में, क्योंकि वे आईएएस थे...एक आयटम था। उसमें पूर्व आईएएस राधाकृष्णन द्वारा माध्यमिक शिक्षा मंडल के चेयरमैन रहते बोर्ड के एकाउंट से साढ़े आठ करोड़ रुपए अपने प्रायवेट खाते में ट्रांसफर करा लेने का जिक्र किया गया था। खबर में यह भी लिखा था कि आईएएस द्वारा डाका डालने के बाद भी पूर्व मुख्य सचिव पी. जॉय उम्मेन, सुनिल कुमार, विवेक ढांड, अजय सिंह, आरपी मंडल और अमिताभ जैन ने आईएएस के खिलाफ कार्रवाई कर रिकवरी निकालने की बजाए आंख मूंद लिया था। इस खबर के पब्लिश होने के बाद पूर्व मुख्य सचिव सुनिल कुमार ने स्तंभकार को व्हाट्सएप मैसेज भेज बताया कि वे फरवरी 2014 में रिटायर हो गए थे। उसके बाद भी राधाकृष्णन माध्यमिक शिक्षा मंडल मे ंचेयरमैन कंटिन्यू कर रहे थे। फिर उस गड़बड़ी के लिए पी. जॉय उम्मेन और सुनिल कुमार दोषी कैसे हुए। वाकई, स्तंभकार से डेट का फैक्ट चेक करने में चूक हुई, इसके लिए खेद है...और, वर्तमान मुख्य सचिव विकास शील से संज्ञान लेने की अपेक्षा भी। विकासशील दिल्ली द्वारा भेजे फर्स्ट सीएस हैं। पिछले स्तंभ में लिखा गया था कि अगर कोई कर्मचारी इस तरह का कृत्य किया होता तो जेल तो जाता ही, रिकवरी भी निकाला जाता। मगर वे आईएएस थे, इसलिए सिस्टम मौन हो गया।
मजबूरी या सम्मान!
इस महीने राज्य सरकार ने 42 आईएएस अधिकारियों को ट्रांसफर किया, उनमें रायपुर संभाग के कमिश्नर महादेव कांवड़े का तबादला लोगों को काफी चौंकाया। वो इसलिए कि कावड़े का इसी महीने रिटायरमेंट है। और उसके 24 दिन पहले उन्हें हटाकर रजिस्ट्रार सहकारिता बना दिया गया। इसके पीछे की वजह यह है कि अगर कावड़े के रिटायरमेंट के लिए 31 मई तक वेट करते तो पूरा ट्रांसफर महीना भर के लिए लटक जाता। वो इसलिए कि, कावड़े की जगह श्याम धावड़े को कमिश्नर बनाना था। और धावड़े के ग्रामोद्योग में किसी और को बिठाना था। हालांकि, पहले योजना यह थी कि कावड़े को महीने भर के लिए बिना विभाग के सचिव बनाकर मंत्रालय में पोस्ट किया जाए। मगर विचार निकलकर आया, रिटायरमेंट से चंद दिनों पहले ऐसा करने से कावड़े अपमानित महसूस करते। लिहाजा, सीआर प्रसन्ना से रजिस्ट्रार सहकारिता का पद महादेव कांवड़े को दिया गया। चूकि 30 और 31 मई को छुट्टी है। इसलिए, कांवड़े 29 मई को रिटायर हो गए। इसके बाद सरकार रजिस्ट्रार की कुर्सी किसी और आईएएस को सौंपेगी। क्योंकि, रजिस्ट्रार कैडर पोस्ट है, इसे खाली नहीं रखा जा सकता। बता दें, महादेव कांवड़े सभी सरकारों में चलने वाले गिने-चुने अफसरों में शामिल थे।
संदेह के घेरे में आईपीएस
इंदौर हनीट्रेप कांड में छत्तीसगढ़ के एक डीआईजी की संलिप्तता की खबर घूम रही है। इस घटना के बाद कई पुलिस उपमहानिरीक्षकों के घरों में कलह शुरू हो गई है। पत्नियां बात-बात पर ताने दे रही। दरअसल, जब तक नाम सामने नहीं आएगा, तब तक सभी डीआईजी लोगों के घरों में यही हालात रहने वाला है। हालांकि, शक के घेरे में आईजी भी हो सकते हैं। क्योंकि, घटना कुछ साल पहले की है, इसलिए हो सकता है हनी ट्रेप के खिलाड़ी प्रमोट होकर आईजी बन गए हों। याने हो कुछ भी सकता है। मगर कब तक? जब तक एमपी पुलिस नाम जाहिर नहीं करती।
हफ्ते का कोट
'जीवन में कुछ बनना है, तो विनम्र रहना सीखें, क्योंकि एक छोटे से बीज को भी जमीन में दबना पड़ता है पेड़ बनने के लिए' और 'जीवन में परवरिश तथा संस्कार भी बहुत मायने रखते हैं, सिर्फ पढ़-लिखकर कोई इंसान नहीं बनता।'
अंत में दो सवाल आपसे?
1. सरकारी अस्पतालों में दवाइयों का संकट होने के बाद भी सीजीएमएससी दवाओं का टेंडर फायनल क्यों नहीं कर पा रहा?
2. क्या ये सही है कि कई मंत्रियों के अनुभवहीन, कमजोर धनलोलुप होने से करप्शन का लेवल बढ़ गया है?

संजय के. दीक्षित: रायपुर इंजीनियरिंग कॉलेज से एमटेक करने के बाद पत्रकारिता को पेशा बनाया। भोपाल से एमजे। पिछले 30 साल में विभिन्न नेशनल और रीजनल पत्र पत्रिकाओं, न्यूज चैनल में रिपोर्टिंग के बाद पिछले 10 साल से NPG.News का संपादन, संचालन।
Tags
-
Home
-
Menu
