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Chhattisgarh Tarkash 2025: मंत्रियों का बीपी हाई

Chhattisgarh Tarkash 2025: छत्तीसगढ़ की ब्यूरोक्रेसी और राजनीति पर केंद्रित पत्रकार संजय के. दीक्षित का पिछले 17 बरसों से निरंतर प्रकाशित लोकप्रिय साप्ताहिक स्तंभ तरकश।

Chhattisgarh Tarkash 2025: रोलर युग में कड़ी और चांदा
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By Sanjay K Dixit

तरकश, 8 फरवरी 2026

संजय के. दीक्षित

मंत्रियों का बीपी हाई

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का जब भी छत्तीसगढ़ दौरा होता है सूबे के मंत्रियों का ब्लडप्रेशन हाई हो जाता है। दरअसल, पहले केंद्रीय गृह मंत्री का छत्तीसगढ़ आना बड़ी घटना होती थी। बस्तर में बड़ी नक्सल हिंसा के बाद केंद्रीय गृह मंत्री शहीद जवानों को श्रद्धांजलि अर्पित करने घंटे-दो घंटे के लिए आते थे। अमित शाह ऐसे गृह मंत्री हैं कि हर दूसरे महीने छत्तीसगढ़ धमक जाते हैं। वो भी दो-तीन घंटे के लिए नहीं, तीन-तीन दिन के लिए। बहरहाल, मंत्रियों का रक्तचाप इसलिए बढ़ जाता है...पता नहीं, उनके कान में कोई कारगुजारी न पहुंच जाए। अब, कारनामे भी तो एक से बढ़कर एक है। कोई अपने माशुका को तीन करोड़ का मकान गिफ्ट कर रहा तो कोई जिले वार वसूली एजेंट तैनात कर डाला है। आधे से अधिक मंत्री दो साल में सिर्फ एक सूत्रीय एजेंडा पर कार्य कर रहे...वो है खुद का विकास। उपर से, कार्यकर्ताओं का कोई काम आए तो अपनी ही सरकार पर लांछन भी...क्या बताएं हमारा कुछ चल नहीं रहा...कोई सुन नहीं रहा है। हालांकि, मंत्रियों को यह भ्रम है कि अमित शाह को यहां आने पर ही उनके बारे में पता चलेगा। आईबी की टीम बिना किसी पूर्वाग्रह के छोटी-से-छोटी जानकारी केंद्र को भेजते रहती हैं। मोदी सरकार ने 360 डिग्री से वॉच का ऐसा मेकेनिज्म बना रखा है कि कोई उससे बच नहीं सकता। सही समय पर एक्शन हो जाता है। कई राज्यों में पूरे मंत्रिमंडल से इस्तीफा ऐसे थोड़े ही ले लिया गया।

छत्तीसगढ़ पुलिस का दुर्भाग्य

पंजाब से आतंकवादियों के उन्मूलन के बाद पंजाब पुलिस की हैसियत ऐसी बढ़ गई थी प्रदेश में उनका रुतबा आईएएस से अधिक हो गया था। तब के डीजीपी जूलियो रिबेरो और केपीएस गिल को भला कौन नहीं जानता था। मगर छत्तीसगढ़ पुलिस का दुर्भाग्य कहिये कि लाल आतंक के खात्मा के समय महकमे की हालत दयनीय है। पुलिस मुख्यालय कुछ कहने-सुनने की स्थिति में नहीं है। पूरा सिस्टम डिरेल्ड हो चुका है। बस्तर की बात आजकल पीएम नरेंद्र मोदी अपने हर बड़ी भाषणों में कर रहे, मगर छत्तीसगढ़ पुलिस के अफसरान बस्तर का क्रेडिट लेने की बजाए या तो बैकफुट पर हैं या फिर अपनों को ही निबटाने में लगे हैं। ये ऐसा वक्त है...जब छत्तीसगढ़ पुलिस पूरे देश में कालर खड़े कर सकती थी। फोर्स को फायदा दिलवाने के साथ पुलिस का इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़वा सकती थी। बस्तर में 10-10 साल से डंप पड़े अधिकारियों और जवानों को वापिस बुला सकती थी...मगर मिलिनयन डॉलर का प्रश्न...ये कौन करेगा? पुलिस का ये दुर्भाग्य तब है, जब देश के अब तक के सबसे ताकतवर गृह मंत्री हर महीने छत्तीसगढ़ आ रहे और राज्य में अब तक के सबसे तेज-तर्रार गृह मंत्री हैं।

जात न देखो अफसर की

मनुस्मृति के अनुसार दण्ड का महत्व समाज में अनुशासन और न्याय बनाए रखने के लिए अत्यंत आवश्यक है। दण्ड का उद्देश्य केवल दंडित करना नहीं है, बल्कि यह समाज में एक चेतावनी रूपी संदेश होता है ताकि सिस्टम में बैठे लोग अपने कार्यों के प्रति जिम्मेदार रहें। मोदी युग में तो दंड का अपना अलग तरीका है। छत्तीसगढ़ सरकार को भी इसका अनुसरण करना चाहिए। वरना, इस जाति का, तो उसका आदमी...अगर देखा जाएगा तो फिर अनुशासनहीनता की घटनाएं और तेज होंगी। आपने देखा ही महिला डीएसपी के खिलाफ अनेक स्थापित साक्ष्य होने के बाद भी सिस्टम ने सस्पेंड करने में महीना भर से ज्यादा लगा दिया। सीएम को पत्र लिखने वाले एसपी के खिलाफ कार्रवाई करने में सिस्टम उलझन में पड़ा है। जबकि, ऐसा होना नहीं चाहिए। अफसर न किसी जाति का होता है और न किसी आदमी और पार्टी का। 2004 की घटना याद होगी, आईएएस अजयपाल सिंह ने मंत्री के खिलाफ प्रेस कांफ्रेंस लिया था तो घंटे भर में सस्पेंड हो गए थे। कहने का आशय यह है कि त्वरित कार्रवाई का अपना एक मैसेज होता है। घटना संज्ञान में आते ही तुरंत कार्रवाई करना दूसरों के लिए सबक होता है।

पैरेंट्स ब्लाइंड या लाचार!

पिछले हफ्ते राजधानी रायपुर में एक शादी थी। लड़का चूकि विदेश में पढ़ाई किया है, इसलिए 20 से अधिक उसके विदेशी फेंड्स भी आए थे। स्वाभाविक तौर से वे पार्टी के केंद्र बिंदु भी रहे। खासकर, विदेशी लड़कियां। विदेशी लड़कियों की शालीन वेशभूषा लोगों के बीच चर्चा का विषय रहा। चिंता का सार यही था कि हम कहां जा रहे हैं...विदेशी लोग कपड़ों के मामले में सभ्य होते जा रहे और हम इतना उदार कि देह की नुमाइश में कंपिटिशिन कर रहे हैं। उस शादी में भी कुछ लोकल लोग ऐसे थे, जिन्हें देख सभ्य लोगों को नजरें नीची करनी पड़ रही थी। बहरहाल, प्रश्न उठता है...क्या पैरेंट्स इतने ब्लाइंड हो गए है कि उनके सामने बच्चे क्या पहनकर घर से निकल रहे या कैसा आचरण कर रहे, उन्हें दिखता नहीं। या फिर जेन जी, जेन जेड युग में इतने लाचार कि बोलने की उनकी हिम्मत नहीं। यह इतना संवेदनशील मसला है कि डर के मारे न कोई पॉलिटिशियन बोल पाएगा या न ही कोई समाज सुधारक। अगर जरा सा भी मुंह खोला तो अगले रोज ही चूड़ी लेकर प्रदर्शन। कुल मिलाकर बच्चों के अच्छे भविष्य के लिए पैरेंट्स को आंखें खोलकर रखनी होगी। वरना आए दिन समाज में जैसी अधर्मी घटनाएं हो रही हैं, वो कम होने की बजाए और तेजी से बढ़ेंगी।

कलेक्टरों की लिस्ट

कलेक्टरों की एक ट्रांसफर लिस्ट अगले हफ्ते के अंत तक आ सकती है। लिस्ट हालांकि, बहुत बड़ी नहीं होगी। दरअसल, बलौदा बाजार कलेक्टर दीपक सोनी सेंट्रल डेपुटेशन पर जाने वाले हैं। पोस्टिंग आदेश के बाद थ्री वीक का उनका ज्वाईनिंग पीरियड खतम हो गया है। मगर धान खरीदी और मतदाता सूची पुनरीक्षण कार्य के चलते रिलीव नहीं किया गया। 14 फरवरी को एसआईआर खतम हो जाएगा। इसके बाद सरकार उन्हें कभी भी कार्यमुक्त कर देगी। दीपक की रिलीविंग के साथ ही कलेक्टरों की एक पोस्टिंग लिस्ट भी निकलेगी। बलौदा बाजार के साथ दो-एक और जिलों के कलेक्टर बदले जा सकते हैं। 2019 बैच के विश्वदीप और रेना जमील कलेक्टर बनने से बच गए हैं। अत्यधिक संभावना है कि इस लिस्ट में 2019 बैच कंप्लीट हो जाए। हालांकि, विश्वदीप की जगह रायपुर नगर निगम का कमिश्नर किसे बनाया जाए, इसकी तलाश अभी पूरी नहीं हुई है। रायपुर जिला पंचायत सीईओ को कमिश्नर बनाने की अटकलें जरूर चल रही है। वैसे दो-एक प्रमोटी आईएएस के भी कलेक्टर बनने की चर्चाएं है, मगर देखना है कि इस लिस्ट में उनका नंबर लगता है या फिर मई में निकलने वाली बड़ी लिस्ट में। कुल मिलाकर 14 या 15 फरवरी को कलेक्टरों की एक लिस्ट आ सकती है।

आईएएस अफसरों का स्टॉपेज

राजधानी रायपुर के प्रॉपर डेवलपमेंट के लिए रमन सरकार ने साल 2004 के लास्ट में रायपुर विकास प्राधिकरण का गठन किया था। कमल विहार के निर्माण याने लगभग 2018 तक इस प्राधिकरण की अहमियत रही, उसके बाद यह आईएएस अफसरों के स्टॉपेज जैसा बन गया है। अफसर आते हैं, और दो-चार महीने में दूसरी पोस्टिंग की रवानगी डाल देते हैं। आरडीए बनने के 21 साल में अभी तक 22 सीईओ पोस्ट हो चुके हैं। खासकर, 2018 से लेकर अभी तक सात साल में 14 सीईओ। कई आईएएस दो-तीन महीने में ही विदा हो गए। बार-बार निजाम बदलने से आरडीए में मौज की स्थिति है। अधिकारी, कर्मचारी मानकर चलते हैं कि नए सीईओ दो-तीन महीने में निकल लेंगे, तो फिर डरना क्यों? हालांकि, आवास और पर्यावरण मंत्री ओपी चौधरी की इच्छा पर सरकार ने इस बार सिकेट्री रैंक के आईएएस अधिकारी अवनीश शरण को आरडीए को ठीक करने की जिम्मेदारी सौंपी है। अब मंत्री ने रुचि ली है...पहली बार किसी बड़े स्तर के आईएएस को इस प्राधिकरण में बिठाया गया है तो देखना है कि इसकी सूरत बदलती है या फिर....?

जोगी डबरी नहीं, विष्णुदेव डबरी

छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने आज से 25 साल पहले छत्तीसगढ़ का वाटरलेवल ठीक रखने डबरी बनाने का फैसला किया था। तब उसे बोलचाल में जोगी डबरी कहा जाता था। जोगी ने अपने कार्यकाल के तीसरे साल में यह सोचकर डबरी की प्लानिंग की थी कि अभी तो उन्हें लंबी पारी खेलनी है। मगर छत्तीसगढ़ की जनता ने उनकी पारी को जल्दी समेट दी। जोगीजी जो काम नहीं कर पाए, अब विष्णुदेव सरकार उसे पूरा करने जा रही है। मनरेगा मद से गांव-गंवई में 12 हजार डबरी बनाने का काम प्रारंभ हो गया है। जाहिर है, छत्तीसगढ़ में जिस तरह पानी का लेवल डाउन हो रहा, उसमें ये डबरी बड़ी कारगर होगी।

अंत में दो सवाल आपसे?

1. छत्तीसगढ़ पुलिस की हनी गर्ल की अगर जांच हो जाए तो कितने आईपीएस, एसपीएस और नेता उसके जद में आएंगे?

2. नगरीय निकायों में एल्डरमैन की नियुक्ति में बीजेपी विलंब क्यों कर रही है?

Sanjay K Dixit

संजय के. दीक्षित: रायपुर इंजीनियरिंग कॉलेज से एमटेक करने के बाद पत्रकारिता को पेशा बनाया। भोपाल से एमजे। पिछले 30 साल में विभिन्न नेशनल और रीजनल पत्र पत्रिकाओं, न्यूज चैनल में रिपोर्टिंग के बाद पिछले 10 साल से NPG.News का संपादन, संचालन।

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