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Chhattisgarh Tarkash 2025: ब्यूरोक्रेसी में संक्रमण काल

Chhattisgarh Tarkash 2025: छत्तीसगढ़ की ब्यूरोक्रेसी और राजनीति पर केंद्रित पत्रकार संजय के. दीक्षित का पिछले 17 बरसों से निरंतर प्रकाशित लोकप्रिय साप्ताहिक स्तंभ तरकश।

Chhattisgarh Tarkash 2025: रोलर युग में कड़ी और चांदा
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By Sanjay K Dixit

तरकश, 4 जनवरी 2025

संजय के. दीक्षित

ब्यूरोक्रेसी में संक्रमण काल

चीफ सिकरेट्री विकास शील कल पांच जनवरी को सभी 34 सचिवों की बैठक लेने जा रहे हैं। इसमें लास्ट मीटिंग में जो टास्क दिए गए थे, उस पर सवाल होगा। विकास शील लगभग हर 15 रोज में सचिवों की क्लास लगा रहे हैं। ऐसा 25 साल में कभी हुआ नहीं। सुनिल कुमार जैसे सबसे तेज-तर्रार चीफ सिकरेट्री के दौर में भी नहीं। टास्क देकर सचिवों को कभी तगादा नहीं किया गया। उपर से भरी बैठक में बिना लाग-लपेट के टोक और नसीहत। अफसरों ने ऐसी स्थिति की कभी कल्पना नहीं की थी। सही भी है...देश की सर्वोच्च सर्विस में सलेक्ट होने के बाद सात घंटा काम करना पड़े, भरी मीटिंग में बात सुननी पड़े, आने-जाने का टाईम नोट किया जाए, तो अधिकारियों का अभिमान आहत होगा ही। उधर, पीएस टू सीएम सुबोध सिंह अफसरों के कामों को वॉच करने अपना अलग अटल पोर्टल लगाकर बैठे हैं। सिकेट्री टू सीएम राहुल भगत सुशासन का एक अलग विभाग खोलवा डाले हैं। जाहिर है, छत्तीसगढ़ की नौकरशाही में संक्रमण काल चल रहा है। याने पुराने से नए दौर में बदलाव की अवस्था। राज्य बनने के बाद 25 साल नौकरशाही अपने मस्त अंदाज में चलती रही। ढाई दशक का यह वक्त शाही ठाठ-बाट और लक्ष्मीजी की प्राप्ति का रहा। जमीन-जायदाद, फार्म हाउसेज, रियल इस्टेट में इंवेस्टमेंट। बिल्डरों, भूमाफियाओं से गलबहियां। मगर, अब चीजें बदल रही हैं। नॉन परफॉर्मिंग किनारे किए जा रहे हैं, परफार्मिंग को अहमियत मिल रही। सिस्टम को डिटॉक्स कर एकाउंटबिलीटी तय की जा रही है। ऐसे में, अफसरों को तकलीफ होना स्वाभाविक है।

100 करोड़ की शराब

छत्तीसगढ़ में साल 2025 की तुलना में 2026 का स्वागत जोरदार रहा। पिछले साल की तुलना में लोगों ने खूब मौज-मस्ती की। होटल, रिसोर्ट एक दिन पहले से फुल हो गए थे। अब मौज-मस्ती बिना शराब के तो हो नहीं सकती। इसलिए, शराब भी इस बार ठीकठाक बिक गई। दो दिन का रेवेन्यू अबकी 100 करोड़ क्रॉस कर गया। छत्तीसगढ़ में पिछले साल 31 दिसंबर और एक जनवरी को 46 और 50 करोड़ की शराब बिकी थी, इस बार थर्टी फर्स्ट को 53 करोड़ और एक जनवरी को 49 करोड़ की बिक्री हुई। याने 102 करोड़ की। इससे एक दिन पहले 30 दिसंबर को भी लोग 36 करोड़ की देसी और अंग्रेजी शराब गटक गए।

ओएसडी की छुट्टी क्यों?

उप मुख्यमंत्री अरुण साव के ओएसडी विपुल गुप्ता की छुट्टी सत्ता के गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। डिप्टी सीएम ने विपुल को ओएसडी बनाया था, तब वे पूर्व सीएम भूपेश बघेल के पाटन के एसडीएम थे। इसको लेकर तब खूब टिका-टिप्पणी हुई थी। फिर भी विपुल ने वहां पूरे दमदारी से काम किया और शानदार दो साल निकाला। मगर जिस अंदाज में उनकी विदाई हुई, स्पष्ट है कि कहीं से कुछ हुआ। तभी मैसेज देने 31 दिसंबर की रात आठ बजे, जब नए साल के स्वागत के स्वागत के मोड में पूरा प्रदेश आ गया था, विपुल गुप्ता की छुट्टी का आदेश निकालने जीएडी सिकेट्री अंशिका पाण्डेय को फोन किया गया। अब प्रश्न उठता है...31 दिसंबर की रात ओएसडी की विदाई क्यों? इसकी तीन संभावित वजह गिनाई जा रही हैं। दो को लिखा नहीं जा सकता। तीसरे की अभी पुष्टि नहीं हुई है। आपको कुछ पता चले तो बताइयेगा।

आर्मीमैन ओएसडी

राज्य प्रशासनिक सेवा के सीनियर अफसर अजय त्रिपाठी को डिप्टी सीएम अरुण साव का नया ओएसडी बनाया गया है। अजय एयरफोर्स से रिटायर होकर आर्मी कोटे से राप्रसे अधिकारी बने। वे अंबिकापुर में एसडीएम तो बिलासपुर जैसे निगम में कमिश्नर रह चुके हैं। राप्रसे अधिकारियों ने भले ही उन्हें स्टेट प्रेसिडेंट की कुर्सी पर बिठा दिया है, मगर तीन-पांच वाले वे हैं नहीं। कवर्धा में जिला पंचायत सीईओ बनकर गए तो एक वीआईपी ने उनका बंगला ही हड़प लिया। बेचारे को रातोरात बोरिया बिस्तर बांध कर सर्किट हाउस में शरण लेनी पड़ी थी। वहां से छूटे तो दूसरे उप मुख्यमंत्री के पास पहुंच गए। चलिये...एक्स आर्मीमैन को ओएसडी बनाकर अरुण साव लगता है अपनी छबि को लेकर संजीदा हुए हैं।

ओएसडी या इंतजाम अली!

छत्तीसगढ़ सरकार गुड गवर्नेंस पर काफी काम कर रही है। उसे कुछ सालों में शुरू हुई खराब परंपराओं को बदलना चाहिए। इनमें राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों को ओएसडी बनाना भी है। पीएससी परीक्षा क्लियर कर राप्रसे अधिकारी मंत्रियों के यहां इंतजाम अली का काम करें, सूबे के लिए ये किसी विडंबना से कम नहीं। छत्तीसगढ़ में रमन सिंह के दौर में दो-तीन राप्रसे ओएसडी थे। पिछली सरकार में सारे मंत्रियों के ओएसडी डिप्टी कलेक्टर हो गए। और इस सरकार में भी वही हो रहा है। मंत्री के बंगले में बैठ सारे काले-पीले कामों को ओएसडी अंजाम देते हैं। मंत्रियों की जिस रास्ते की जानकारी नहीं होती, वो ओएसडी लोग सुझाते हैं। वे इंतजाम अली की भूमिका निभाते हैं और खाजांची की भी। रमन सरकार के दौर में अमर अग्रवाल, अजय चंद्राकर, राजेश मूणत जैसे मंत्री कभी भी अपने स्टाफ को लिमिट क्रॉस करने की छूट नहीं दी, इस वजह से इन मंत्रियों पर कोई इल्जाम नहीं लगा। इस सरकार में ओपी चौधरी के स्टाफ को मंत्रालय से आदेश निकलने के बाद पता चलता है कि उनके विभागों में ट्रांसफर हुआ है।

ऐतिहासिक फैसला, मगर...

छत्तीसगढ़ की मंत्रिपरिषद ने पुलिस में बड़ा रिफार्म करते हुए रायपुर में पुलिस कमिश्नर सिस्टम प्रारंभ करने का रास्ता साफ कर दिया है। इसके लिए 23 जनवरी का डेट भी फायनल कर दिया गया है। इसके बाद देश के पुलिस कमिश्नर सिस्टम के नक्शे में छत्तीसगढ़ का नाम भी जुड़ जाएगा। मगर इसके लिए जो एरिया तय किया गया है, वह इसकी सफलता पर संशय खड़ा करता है। पंडरी के आगे का पुराना विधानसभा थाना, माना, नवा रायपुर, अभनपुर जैसे बाहरी इलाके इससे अलग होंगे। याने पुलिस कमिश्नर का कार्यक्षेत्र सिटी एसपी से भी कम हो गया। जबकि, गृह विभाग भी इस वास्तविकता ये अवगत होगा कि शहरों के आउटर में ही सबसे अधिक क्राइम होते हैं और आउटर ही क्रिमिनल के ठौर-ठिकानों के लिए सबसे मुफीद होते हैं। और यही इलाके पुलिस कमिश्नर के दायरे में नहीं होंगे। फिर यह भी...माना एयरपोर्ट पर कोई वीवीआईपी आएगा तो ग्रामीण एसपी उसे रिसीव करेंगे और वीआईपी रोड पर आने के बाद फिर पुलिस कमिश्नर। रायपुर से मंत्रालय और विधानसभा जाने वाले मंत्रियों के लिए अब डबल पायलेटिंग की व्यवस्था करनी होगी। माना थाना से पहले तक रायपुर पुलिस कमिश्नर अपनी गाड़ी लगाएंगे और माना के आगे रायपुर ग्रामीण एसपी की व्यवस्था रहेगी। बहरहाल, सवाल यह नहीं है कि पुलिस कमिश्नर को सरकार कौन-कौन सा अधिकार देगी, फिलहाल, प्रश्न यह है कि जब आधे से कम जिले में कमिश्नर सिस्टम लागू होगा तो रिजल्ट की अपेक्षा क्यों और कैसे की जाएगी? निश्चित तौर पर छत्तीसगढ़ सरकार ने पुलिस में रिफार्म का बड़ा प्रयास किया है। मगर पता नहीं कैसे, इसमें कुछ कसर रह गई, उसे दूर करना चाहिए।

वोट जरूरी या प्रदेश

तमनार हिंसा में महिला पुलिस का वीडियो देखकर गृह विभाग और पुलिस महकमे की नजरें नीचे हुई कि नहीं...ये मालूम नहीं। मगर यह जरूर है कि पार्टी-पॉलिटिक्स से दूर अब छत्तीसगढ़ में पोलिसिंग को सशक्त बनाने का समय आ गया है। वरना, स्थिति इतनी खराब हो जाएगी कि उसे संभालना मुश्किल हो जाएगा। पिछले पांच सालों की घटनाओं पर गौर करें तो सुकमा कलेक्ट्रेट में भीड़ का घुसकर तोड़फोड़ करना, नारायणपुर में एसपी पर हमला, बलौदा बाजार में कलेक्ट्रेट, एसपी ऑफिस को फूंक देना। सरगुजा के अमेरा कोल ब्लॉक में पुलिस पर पथराव। 10 दिन के भीतर कांकेर और तमनार जैसी हिंसा। महिला पुलिस पर तालिबानी हमला। जाहिर है, वोट बैंक के चक्कर में छत्तीसगढ़ के गांव जातियों में बंटते जा रहे, शहरों में धार्मिकता बढ़ रही तो शांतप्रिय माने जाने वाले कुछ वर्गों में आक्रमता घर कर रही है। इसके लिए पुलिस का पेशेवर होना जरूरी हो गया है। नहीं तो नक्सलवाद के नासूर से मुक्ति के बाद प्रदेश दूसरे संघर्ष में उलझ जाएगा। सियासी लोगों को भी समझना होगा...वोट का कोई मतलब तभी होगा, जब प्रदेश में सब ठीक रहेगा। और शांति के लिए पुलिस का संशाधनों से लैस होना आवश्यक है। वैसे भी पुलिस कोई सामान्य विभाग नहीं। वह आम आदमी का भरोसा है। बड़े और रसूखदार लोगों के खुद का कनेक्शन होने से उनका कोई काम रुकता नहीं। मगर कोई विपदा आने पर आम आदमी सबसे पहले थाने पहुंचता है। उसी पुलिस पर अगर लात-जूते और डंडे बरसाये जाएं, तो सोचिए आम आदमी के विश्वास पर यह कितनी बड़ी चोट होगी। इसलिए, पोलिसिंग को टॉप प्रायरिटी देने का वक्त आ गया है।

उधार में खुफिया

मध्यप्रदेश के दौर में एलआईबी का बड़ा तगड़ा नेटवर्क होता था। कॉफी हाउस, सामाजिक संगठनों और अखबार के दफ्तरों में एलआईबी वाले आए दिन बैठे होते थे। मगर छत्तीसगढ़ बनने के बाद खुफिया विभाग पर कभी ध्यान नहीं दिया गया। 25 साल में छत्तीसगढ़ के इंटेलिजेंस में एक आदमी की भर्ती नहीं हुई। जबकि, खुफिया में डीएम अवस्थी, मुकेश गुप्ता, अशोक जुनेजा जैसे अफसर रहे। बावजूद इसके छत्तीसगढ़ का इंटेलिजेंस उधार के पुलिस कर्मियों के भरोसे खींचता रहा। अब उधार याने डेपुटेशन पर आने वालों से इंफरमेशन की उम्मीद कैसे की जा सकती है। उन्हें तो मालूम है कि दो-चार साल बाद फिर अपने थानों में लौट जाना है। अब आवश्यक हो गया है, रेगुलर भर्तियां कर खुफिया सिस्टम को मजबूत किया जाए।

डीएमएफ दोषी!

कहा जाता है कि लीडर अगर बढ़िया रहें तो नीचे वाले अपने आप अच्छे हो जाते हैं। छत्तीसगढ़ के साथ बुरी स्थिति यह हुई कि पुलिस के लीडर ही बहक गए। इसके लिए काफी कुछ जिम्मेदार पूर्व मुख्यमंत्री डॉ0 रमन सिंह और कलेक्टरों का डीएमएफ रहा। रमन सिंह ने शराब के ठेके बंद कर दिए और उपर से ट्रांसपोर्ट के बैरियर हटा दिए। पुलिस को मुख्यतः शराब और बैरियर से पैसे आते थे...रमन सरकार के फैसले से आय के दोनों जरिये क्लोज हो गए। उधर, कलेक्टरों का डीएमएफ और बढ़ता गया। कलेक्टर दोनों हाथ से लक्ष्मीजी की आवभगत करते रहे और बेचारे एसपी उन्हें देखकर कसमसाते रहे। बहरहाल, आय के इन दोनों स्त्रोतों के बंद होने का नतीजा रहा कि पुलिस को अपना लेवल डाउन कर कबाड़ी, जुआ-सट्ा पर अपना फोकस बढ़ाना पड़ा। फिर भी कम पड़ा तो एसपी लगे थानों का रेट फिक्स करने। छत्तीसगढ़ के अधिकांश जिलों में अब ये चलन बन गया है। थानों की बोली लगती है। छत्तीसगढ़ के 50 थाने ऐसे हैं, जिसके लिए प्रति महीने दो पेटी से लेकर पांच पेटी तक की बोली लगती है। जाहिर सी बात है, थानेदार महीने का दो लाख देगा तो पांच लाख का इंतजाम अपने लिए भी करेगा। ऐसे में, पोलिसिंग की उम्मीद क्यों की जानी चाहिए?

118 नेताओं में चुनाव

बीजेपी ने राष्ट्रीय अध्यक्ष चुनने के लिए पूरा एक साल एक्सरसाइज किया। 28 राज्यों के 40 से 50 साल के युवा नेताओं का डेटाबेस तैयार किया। सबकी कुंडली खंगालने और फिल्टर करने के बाद 18 की लिस्ट बनाया गया। बताते हैं, यह काम इतनी सर्तकता के साथ किया गया कि किसी को भनक नहीं लग पाई कि इसका असली मकसद क्या है। डेटा एकत्र करते समय बताया गया कि पार्टी भविष्य के युवा नेताओं का सर्वे करा रही है। बहरहाल, 18 के फायनल पेनल में एक नाम बिहार के कैबिनेट मंत्री नितिन नबीन का था। पार्टी ने उन्हें उपयुक्त मान कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित कर दिया। यह जानकार आपको आश्चर्य होगा कि छंटनी के बाद तैयार की गई 18 में छत्तीसगढ़ के एक युवा नेता का नाम भी शामिल था।

2019 बैच कंप्लीट

छत्तीसगढ़ के दो जिले के कलेक्टर डेपुटेशन पर दिल्ली जा रहे हैं। संभवतः इसी महीने उनका पोस्टिंग आर्डर निकल जाए। इसके बाद कलेक्टरों की एक लिस्ट निकलेगी। काफी संभावना है कि इस लिस्ट में 2019 बैच की कलेक्टरी कंप्लीट हो जाए। इस बैच के विश्वदीप और रैना जमील को छोड़ सभी कलेक्टर बन गए हैं। जीतेंद्र यादव को सबसे पहले राजनांदगांव का कलेक्टर बनाया गया। उनके बाद नम्रता जैन को कोंडागांव और अमित कुमार को सुकमा। नए साल में विश्वदीप और रैना जमीन को कलेक्टरी का तोहफा मिल सकता है। हालांकि, विश्वदीप रायपुर नगर निगम कमिश्नर हैं। रायपुर निगम कमिश्नर की पोस्टिंग छोटे जिलों की कलेक्टरी से ज्यादा एक्सपोजर वाली होती है। इसलिए, विश्वदीप को भी कलेक्टर बनने की कोई जल्दी नहीं होगी।

अंत में दो सवाल आपसे?

1. इस बात में कितनी सत्यता है कि छत्तीसगढ़ में होली के बाद पूरे मंत्रिमंडल का इस्तीफा हो जाएगा?

2. छत्तीसगढ़ में आईपीएस जीपी सिंह को लेकर चर्चाएं क्यों शुरू हो गई है?

Sanjay K Dixit

संजय के. दीक्षित: रायपुर इंजीनियरिंग कॉलेज से एमटेक करने के बाद पत्रकारिता को पेशा बनाया। भोपाल से एमजे। पिछले 30 साल में विभिन्न नेशनल और रीजनल पत्र पत्रिकाओं, न्यूज चैनल में रिपोर्टिंग के बाद पिछले 10 साल से NPG.News का संपादन, संचालन।

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