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Chhattisgarh Tarkash 2024: मंत्री पद के सपने

Chhattisgarh Tarkash 2024: छत्तीसगढ़ की ब्यूरोक्रेसी और राजनीति पर केंद्रित वरिष्ठ पत्रकार संजय दीक्षित का 15 बरसों से निरंतर प्रकाशित लोकप्रिय साप्ताहिक स्तंभ तरकश

Chhattisgarh Tarkash 2024: मंत्री पद के सपने
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By Sanjay K Dixit

तरकश, 19 मई 2024

संजय के. दीक्षित

मंत्री पद के सपने

जैसे-जैसे लोकसभा चुनाव 2024 की काउंटिंग के दिन नजदीक आते जा रहे...छत्तीसगढ़ में मंत्री पद के दावेदारों की धड़कनें बढ़ती जा रही हैं। पुराने और अनुभवी मंत्रियों से ज्यादा पहली बार वाले याने नए विधायक उत्साहित नजर आ रहे हैं। कई तो तिरुपति से लेकर बाबा विश्वनाथ और महाकाल के दरबार में मन्न्त मांगकर आ गए हैं। रायपुर के एक नए विधायक की उम्मीदों का मत पूछिए...वे मंत्रालय में बैठने के लिए अपनी जगह भी देख कर आ चुके हैं। दरअसल, राजस्थान में पहली बार के विधायक भजनलाल को सीएम बनाकर मोदीजी ने नए विधायकों की उम्मीदों और महत्वकांक्षाओं में पंख लगा दिया। लिहाजा, सभी को लग रहा कि उनका नंबर लग सकता है। इससे दीगर, मंत्रिमंडल की सर्जरी को लेकर भांति-भांति के परसेप्शन भी निर्मित किए जा रहे हैं। मसलन, पुराने मंत्री ड्रॉप होंगे...लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद फलां मंत्री बदल जाएंगे। दरअसल, छत्तीसगढ़ में खासकर रायपुर अफवाहों की मंडी है। यहां कोई अपना दिमाग नहीं लगाता...कौवा कान ले गया तो फिर ले गया। सीधी सी बात है कि सियासत में बिना किसी ठोस वजह छह महीने, साल भर में मंत्रियों को नहीं हटाया जाता और न ही किसी शीर्ष नेता को बदला जाता। मगर रायपुर का हर तीसरा आदमी लोकसभा चुनाव के बाद किसी-न-किसी को बदल दे रहा।

वेटिंग इन पोस्टिंग-1

दिल्ली डेपुटेशन से होम कैडर लौटी छत्तीसगढ़ की सीनियर आईएएस ऋचा शर्मा 1 मई को मंत्रालय में ज्वाईनिंग दे दी थी। मगर 18 दिन बाद भी उन्हें पोस्टिंग नहीं मिली है। हो सकता है कि लोकसभा चुनाव की वजह से पोस्टिंग लटकी हो। चुनाव प्रचार के सिलसिले में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय इन दिनों बेहद व्यस्त चल रहे हैं। मगर चर्चाओं को कौन रोक सकता है। एसीएस लेवल की सीनियर आईएएस अफसर को पखवाड़े भर से अधिक समय होने के बाद भी पोस्टिंग न मिलने से ब्यूरोक्रेसी में उत्सुकता बढ़ती जा रही है। भांति-भांति की अटकलें चालू है...इतना लेट हो रहा इसका मतलब कोई बड़ी लिस्ट निकलने वाली है...सोनमणि बोरा को 15 दिन में कैसे पोस्टिंग मिल गई! किसी को लग रहा...ऋचा के लिए कुछ बड़ा हो रहा...। वरना, सिंगल नाम पर इतना टाईम नहीं लगता! हालांकि, उच्च स्तर के सूत्रों का कहना है कि लिस्ट सिंगल ही आनी चाहिए। मगर सरकार है...कुछ भी हो सकता है। लिस्ट में नाम जोड़ने-घटाने की संभावनाएं हमेशा बनी रहती है।

वेटिंग इन पोस्टिंग-2

सेंट्रल डेपुटेशन से लौटने वाले अफसरों की पोस्टिंग में विलंब पहली बार नहीं हुआ है। चीफ सिकरेट्री अमिताभ जैन के समय भी ऐसा हो चुका है। बीजेपी सरकार में अमिताभ जब दिल्ली से लौटे थे, तब करीब महीने भर उन्हें पोस्टिंग के लिए वेट करना पड़ा था। उन्हीं के आसपास अमित अग्रवाल भी छत्तीसगढ़ आए थे। अमिताभ तब प्रमुख सचिव थे और अमित सचिव। दोनों को महीने भर बाद ही विभाग मिल पाया। 2016 में गौरव द्विवेदी के साथ भी ऐसा ही हुआ था। गौरव को आफिसर्स मेस में महीने भर से अधिक समय तक पोस्टिंग के लिए इंतजार करना पड़ा था। जाहिर है, चीफ सिकरेट्री अमिताभ जैन खुद वेटिंग इन पोस्टिंग के दर्द से गुजर चुके हैं।

आब्जर्बर की किस्मत

चुनाव में आब्जर्बर बनने से अधिकांश आईएएस, आईपीएस घबराते हैं। उन्हें लगता है खामोख्वाह चुनाव के लफड़े में क्यों पड़े। मगर कुछ किस्मती अफसरों को आब्जर्बर के तौर पर बढ़ियां लोकसभा इलाका मिल जाता है। मसलन, छत्तीसगढ़ से डेढ़ दर्जन से अधिक अफसरों की चुनावी ड्यूटी लगी है, उनमें संजीव झा और विनीत नंदनवार खुशकिस्मत निकले। संजीव को अलीबाग जैसे रमणिक इलाके का आब्जर्बर बनाया गया है तो उनसे और आगे निकल गए विनीत नंदनवार। विनीत को हिमाचल के मंडी लोकसभा क्षेत्र के आब्जर्बर की जिम्मेदारी दी गई है। मंडी में ही कुलु मनाली आता है। और उससे भी बड़ा यह कि फिल्म अभिनेत्री कंगना राणावत वहां से चुनाव लड़ रही है। कंगना ने नामंकन का पर्चा भरने के बाद ट्वीट किया, उसमें विनीत भी कलेक्टर के डायस के बगल में बैठे दिखाई पड़ रहे हैं। विनीत स्मार्ट और हैंडसम तो हैं हीं...कंगना ने खासतौर से उन्हें अपनी फोटो में कवर किया। चलिये, किस्मत अपनी-अपनी।

डिरेल्ड कलेक्टर, बड़ी चुनौती-1

छत्तीसगढ़ में कुछ सालों से कलेक्टरों की भूमिका और पदनाम बदल गया है। खासकर, जब से डीएमएफ आया...कलेक्टरों का औरा और प्रतिष्ठा बुरी तरह डिरेल्ड हुई है। अब वे डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट नहीं, डिस्ट्रिक्ट माईनिंग फंड अफसर हो गए हैं। नई सरकार में भी कलेक्टरों का सूरते-अंदाज नहीं बदला। काम काज एक ढेला का नहीं, न्यौता भोज में खाना परोसों और खुद बैठकर खाते फोटो खिंचवाओ। चुनाव में आयोग ने खूब पैसे दे दिए वोटरों को जागृत करने के लिए। इसका फायदा कलेक्टरों ने अपनी ब्रांडिंग के लिए कर ली। बाकी जितना पैसा खर्चा हुआ, उस हिसाब से पता कर लीजिए...किस जिले में वोटिंग का कितना परसेंटेज बढ़ा?

डिरेल्ड कलेक्टर, बड़ी चुनौती-2

छत्तीसगढ़ में कलेक्टरों का सिस्टम पिछले 10 साल में बुरी तरह ध्वस्त हो गया है। सिर्फ कागजों में काम, सोशल मीडिया में फोटो और उपर से कोई निर्देश आ गया तो उसे पूरा कर दो। उसके अलावा आम आदमी का कोई माई-बाप नहीं। मगर अब विष्णुदेव सरकार नए मोड में है। उपर से नहीं दिख रहा मगर भीतर-ही-भीतर बडे़ काम हो रहे हैं। सचिवों के साथ ही कलेक्टरों को काम पर लगाया जा रहा है। पिछले दसेक दिन में राज्य सरकार ने कई आदेश और सर्कुलर जारी किया है। प्रायवेट स्कूलों के संचालकों की मीटिंग कलेक्टरों को लेनी है और मोटी फीस से लेकर यूनिफार्म में कमीशन तथा आरटीई में एडमिशन की रिपोर्ट सरकार को भेजनी है। कलेक्टर पहले ऐसे कामों को अपनी तौहिनी समझते थे। नीचे के अफसर मीटिंग कर फोटो खिंचवा कोरम पूरा कर लेते थे। मगर अब कलेक्टरों को इस तरह की कई जिम्मेदारियां सौंपी जा रही है, जिसके अब वे आदि नहीं हैं। जाहिर है, उनकी मुश्किलें बढ़ने वाली है।

सिकरेट्री, आईजी सोते रहे...

छत्तीसगढ़ बनने के बाद रजिस्ट्री विभाग रामभरोसे चलता रहा। सिकेरट्री और आईजी सोते रहे और रजिस्ट्री अधिकारी सरकारी खजाने और इनकम टैक्स को चूना लगाते रहे। बताते हैं, पिछले 10 साल में गाइडलाइन रेट में अपने मनमर्जी से रेट कम करके अफसरों ने करीब 200 करोड़ करोड़ का फटका लगा दिया। जबकि, सरकारी रेट को कम करने का उन्हें अधिकार ही नहीं। आखिर, जिस रेट को कई विभागों के आईएस एचओडी की कमेटी तय करती है, उसे नीचे के अधिकारी कैसे बदल सकते हैं? दरअसल, गाइडलाइन रेट कम करने के बिल्डरों और भूमाफियाओं को रजिस्ट्री लागत कम हो जाती है और एक नंबर का पैसा कम लगने पर इंकम टैक्स में बड़ी राहत मिल जाती है। रजिस्ट्री विभागों के दलालों और अधिकारियों के साथ मिलकर छत्तीसगढ़ के बिल्डर और भूमाफिया सालों से रेट कम कराने का खेला कर रहे थे और उपर में किसी को पता नहीं था। शिकायतों के बाद पड़ताल हुई तो इसका खुलासा हुआ। पंजीयन विभाग के मंत्री ओपी चौधरी ने गाइडलाइन रेट कम करने पर रोक लगा दी है। इससे रजिस्ट्री अफसरों में ही नहीं, बल्कि दलालों और बिल्डरों में खलबली मच गई है। रजिस्ट्री अधिकारियों की रात की नींद उड़ गई है। असल में, पेट पर लात से तकलीफ तो होती ही है।

अंत में दो सवाल आपसे

1. छत्तीसगढ़ के बड़े लोगों को ये चिंता क्यों खाए जा रही कि सरकार में चल किसकी रही है? काम कहां से होगा?

2. क्या नए मंत्रियों में एक नाम दुर्ग के विधायक गजेंद्र यादव का भी नाम होगा?

Sanjay K Dixit

संजय के. दीक्षित: रायपुर इंजीनियरिंग कॉलेज से एमटेक करने के बाद पत्रकारिता को पेशा बनाया। भोपाल से एमजे। पिछले 30 साल में विभिन्न नेशनल और रीजनल पत्र पत्रिकाओं, न्यूज चैनल में रिपोर्टिंग के बाद पिछले 10 साल से NPG.News का संपादन, संचालन।

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