भाजपा अपने आधार मूल्यों से डिग गई है.. कार्यकर्ता हताश..नेता ठेकेदार हुए..नहीं सम्हले तो सिमट जाएगी भाजपा” उत्तर छत्तीसगढ़ का वह कद्दावर आदिवासी नेता, जिसने सच कहा.. अपमानित हुआ.. पर भविष्यवाणी सच निकली अपने आधार स्तंभ को भूली भाजपा..पुण्यतिथि पर एक माला तक नही.

रायपुर,30 नवंबर 2019। पंद्रह बरस तक प्रदेश में सत्ता पर सवार भाजपा आज अर्श से फ़र्श पर है। पंद्रह बरस तक सरकार में क़ाबिज़ भाजपा जिस आंकडे के साथ लस्त पस्त दिख रही है,जिस सन्निपात में वो आज नुमाया हो रही है, उसकी भविष्यवाणी 10 बरस पहले एक शख़्स ने की थी, सच बोलने का ख़ामियाज़ा उसे पार्टी से निलंबित होकर भुगतना पड़ा। अगर्चे वह बात मान ली जाती उसे तब सुन लिया जाता तो बहुत संभव है यह हालत नहीं होते, सियासत में उलट फेर होते रहते हैं लेकिन कम से कम सदन के भीतर भाजपा सदस्यों के आंकड़े इस विशेषण के साथ तो नहीं हैं कि कहा जाए
“एक दर्जन केले से दो ज़्यादा”
क्या ही गजब हाल है कि, जिस शख़्स ने सरकारी नौकरी को ठोकर मारकर पूरा जीवन पार्टी के लिए होम कर दिया,जिस उत्तर छत्तीसगढ़ में भाजपा का संगठन जिसने गढ़ा.. संवारा.. निखारा..उसकी पुण्यतिथि गुजर गई पर किसी को याद तक नहीं आई। यह वो शख़्स था जिसे कुशाभाउ ठाकरे ने खोजा था, विधायक फिर मंत्री और राज्यसभा सांसद के साथ साथ प्रदेश अध्यक्ष रह चुका यह शख़्स था शिवप्रताप सिंह।

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शिवप्रताप सिंह का निधन 29 नवंबर 2014 को रायपुर में उपचार के दौरान हुआ था। यही 29 नवंबर जो कैलेंडर में कल की तारीख़ थी। जिस दिन भाजपा प्रदेश कार्यालय में प्रदेश प्रभारी अनिल जैन की अगुवाई में प्रदेश के दिग्गज नगरीय निकाय जीतने की रणनीति बना रहे थे। ये दिग्गज इस सवाल से जूझ रहे थे कि पार्टी के मूल कैडर कार्यकर्ता के भीतर फिर से विश्वास और उर्जा कैसे जगाई जाए। इस सवाल से जूझते हुए किसी को भी याद नहीं आया कि, दस बरस पहले प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए कोई बूजूर्ग धीर गंभीर तरीक़े से चेतावनी दिया था, जो भविष्यवाणी की तरह सच निकली।

यह चेतावनी थी –
“कार्यकर्ता उदास है.. चुंकि पार्टी माँ की तरह है तो उसके प्रति समर्पित है.. पर जब माँ का निरंतर अपमान देखेगा.. तो माँ को लिए अपने घर बैठ जाएगा.. ठेकेदार नेता बन गए हैं.. अधिकारी बेलगाम हैं.. आज सत्ता है.. पर ये अस्थाई है.. कार्यकर्ता ही मूल है.. नही चेते.. नहीं सम्हले तो सिमट जाएगी भाजपा”
जिस प्रदेश कार्यालय में मंथन चल रहा था, वहाँ इस बूजूर्ग की किसी को याद नहीं आई,तो तस्वीर पर पड़ी धूल को झाड़ने और उस पर ताज़ा माला लगाने की बात दूर है।हालाँकि पक्के तौर पर यह कह पाना मुश्किल है कि आज भव्य महल के रुप में स्थापित भाजपा के पास अपने इस नींव के पत्थर की कोई तस्वीर भी है या नहीं। जिस सूरजपुर ज़िला से शिवप्रताप आते थे, वहाँ के ज़िला कार्यालय में भी किसी को ध्यान नहीं रहा, दिलचस्प था कि, सुरजपुर कार्यालय कल नगरीय निकाय में प्रत्याशियों की तलाश में जूटा हुआ था। जबकि सरगुजा भाजपा कार्यालय वीरान था।

शिवप्रताप सिंह 1972 में सियासत में आए, वे संगठन शिल्पी कुशाभाउ ठाकरे की तलाश थे। तब वे उस पाल विधानसभा से चुनाव लड़ कर जीते जिसकी सीमाएँ आज की भटगांव और प्रतापपुर और रामानुजगंज विधानसभा को समाहित रखती थीं। यह वह दौर था जबकि इलाक़े में कांग्रेस की तूती बोलती थी, बिहारपुर जैसे इलाक़ों में “लाल-साहबों” का फ़रमान किसी भी सरकारी फ़रमान पर भारी होता था।शिवप्रताप सिंह ने विधानसभा का चप्पा चप्पा सायकल और पैदल से नाप दिया था।

सोनपुर गाँव में अपने घर के दालान में बैठे हुए शिवप्रताप ने कभी अपने क़िस्से इस खबरनवीस को बताए थे। शिवप्रताप सिंह ने बताया था
“जब मैं काम शुरु किया तो बाक़ी की छोड़ो मेरे रिश्तेदार भी थोड़ा बचना ही पसंद करते थे, कांग्रेस का मतलब ही कुछ ऐसा था कि, आप को विरोध में देखने का मतलब अपना अपमान कराना होता था, मुश्किलें बहुत आईं, प्रचार में जाता था, तो अपमानित करते थे, बहुत ज़्यादा अपमानित, लेकिन लोग समझने लगे और जुड़ते गए और संगठन खड़ा हो गया”
शिवप्रताप सिंह शायद पुलिस सिपाही रहते अगर राजनीति में नहीं आते। सियासी जीवन में शिवप्रताप तीन चुनाव हारे, दिलचस्प यह भी है कि दो चुनाव तो वे “खुले भीतरघात” से हारे।1993 की पटवा सरकार में वे राज्यमंत्री रहे,1998 और 2003 में भी उन्होंने जीत दर्ज की। वे उन चुनिंदा कार्यकर्ताओं में से एक रहे थे, जो मंडल अध्यक्ष फिर ज़िला अध्यक्ष और प्रदेश अध्यक्ष भी बने।

तत्कालीन सरकार को ठेठ सरगुजिहा अंदाज में खर्रा खर्रा सुनाने के बाद जब उन पर अनुशासनात्मक कार्रवाई हुई तो शिवप्रताप ने कहा-
“बतौर अध्यक्ष मेरा दायित्व था कि कार्यकर्ता की भावना को पहुँचाता.. आख़िर हमारे दल का प्राण उसका मूल तो कार्यकर्ता ही है.. दौर बदल गया है शायद.. पहले संगठन सत्ता को चलाता था.. अब सत्ता के ईशारे संगठन चल रहा है.. लेकिन मुझे ख़ुशी है मैंने अपना दायित्व निभाया”
शिवप्रताप सिंह पूरी ज़िंदगी लड़ते ही रहे, सन् 1980 में कार्यकर्ता के लिए थानेदार से हुई भिड़ंत आज की युवा पीढ़ी को याद ही नहीं होगी।तब जब थानेदार का मतलब थानेदार होता था, और तंत्र पूरी तरह कांग्रेसमय था। राष्ट्रीय ध्वज फहराने की लड़ाई शिवप्रताप सिंह को मुक़दमों में फंसा गई थी, पर वे लड़ते रहे। कार्यकर्ताओं के लिए अपने दल के लिए संगठन के लिए।

शिवप्रताप सिंह जब प्रदेश अध्यक्ष थे, तब उनका परिवार चर्चा में आया था, क्योंकि पंच सरपंच जनपद और ज़िला पंचायत तक में उनके अपने परिवार के लोग थे। शिवप्रताप सिंह पर आरोप लगा कि उन्होंने केवल दल के हित का आवरण ओढ़ा वे परिवारवाद को बढ़ावा दे रहे हैं। तब शिवप्रताप सिंह ने यह जवाब देकर विरोधियों को चुप करा दिया-
“जो भी पद हैं, वे निर्वाचित पद हैं, लोग चुनाव लड़े और जीते.. इनमें परिवारवाद कैसे आ गया.. और यह भी ध्यान रखना चाहिए कि जो भी जीते हैं उनकी निष्ठा परिवार नहीं भाजपा ही है”
शिवप्रताप सिंह का निधन रायपुर में किडनी के उपचार के दौरान हुआ। उन्हें मधुमेह था। शिवप्रताप ने जो कहा, वो तब भी सच था और आज भी सच है.. पर आख़िरकार यह भी दर्ज हो गया कि, उनके दल को ही उनकी याद नहीं आई।

किसी अनाम कवि की पंक्तियाँ बेहद प्रासंगिक हैं
“पुरानी शाख से पूछे ज़िन्दगी की जद्दोजहद
नए पत्ते तो बस अपनी अदाकारी में रहते हैं”

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