Ajit Pawar Biography Hindi: अजित पवार की जीवनी, राजनीतिक सफर, सत्ता, संघर्ष और विवादों के बीच बने 5 बार डिप्टी सीएम
Ajit Pawar Political Career: महाराष्ट्र के दिग्गज नेता अजित पवार का राजनीतिक सफर सत्ता, संघर्ष और विवादों से भरा रहा। उनके उप मुख्यमंत्री कार्यकाल और राजनीतिक भूमिका पर एक नज़र।

नई दिल्ली | 28 जनवरी 2026: हालिया डेढ़ दशक से महाराष्ट्र की राजनीति के प्रमुख चेहरों में शामिल अजित पवार लंबे समय तक राज्य की सत्ता और संगठनात्मक राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं। उनके राजनीतिक जीवन में सत्ता, संघर्ष और विवाद तीनों का गहरा प्रभाव रहा है।
आज 26 जनवरी 2026 को महाराष्ट्र के बारामती में एक विमान हादसा जिसमें महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम अजित पवार सहित पांच लोगों की मौत हो गई है। घटना के बाद मौके पर रेस्क्यू अभियान चलाया जा रहा है।
जानकारी के मुताबिक महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम अजित पवार चार्टर्ड प्लेन से बारामती में 4 सभाओं को संबोधित करने जा रहे थे। तभी बुधवार सुबह 8:45 को उनका चार्टर्ड प्लेन बारामती एयरपोर्ट पर लैंडिग के दौरान क्रैश हो गया। प्लेन में अजित पवार के साथ ही उनके पर्सनल असिस्टेंट, सुरक्षाकर्मी और प्लेन स्टाफ सहित 5 लोग सवार थे। इस घटना में अजित पवार सहित सभी की मौत हो गई है।
पाँच बार डिप्टी सीएम रहने का रिकॉर्ड
अजित पवार पिछले 13 वर्षों में पाँच बार महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री रहे। वह राज्य के सबसे लंबे समय तक लगातार उप मुख्यमंत्री रहने वाले नेताओं में गिने जाते हैं। आइये उनके कार्यकाल पर एक नजर डालते हैं-
- 10 नवंबर 2010 – 25 सितंबर 2012 (मुख्यमंत्री: पृथ्वीराज चव्हाण)
- 25 अक्टूबर 2012 – 26 सितंबर 2014 (मुख्यमंत्री: पृथ्वीराज चव्हाण)
- 23 नवंबर 2019 – 26 नवंबर 2019 (मुख्यमंत्री: देवेंद्र फडणवीस)
- 30 दिसंबर 2019 – 29 जून 2022 (मुख्यमंत्री: उद्धव ठाकरे)
- 2 जुलाई 2023 – आगे (मुख्यमंत्री: एकनाथ शिंदे / देवेंद्र फडणवीस सरकार)
- दिसंबर 2024 से वह देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में एकनाथ शिंदे के साथ राज्य के 8वें उप मुख्यमंत्री थे।
कौन हैं अजित पवार
अजित अनंतराव पवार का जन्म 22 जुलाई 1959 को महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में हुआ था। वह शरद पवार के बड़े भाई अनंतराव पवार के पुत्र थे। राजनीति में उन्होंने अपने चाचा शरद पवार के नक्शेकदम पर चलते हुए प्रवेश किया और समर्थकों के बीच ‘दादा’ के नाम से पहचाने गए।
उनकी शुरूआती शिक्षा देओली प्रवर से और माध्यमिक शिक्षा महाराष्ट्र शिक्षा बोर्ड से हुई, शिक्षा माध्यमिक स्तर तक रही, लेकिन राजनीति और सहकारिता में अनुभव ने उन्हें प्रभावशाली नेता बनाया।
राजनीतिक सफर की शुरुआत
अजित पवार ने 1982 में महज़ 20 वर्ष की उम्र में राजनीति में कदम रखा। शुरुआत एक चीनी सहकारी संस्था के चुनाव से हुई। 1991 में वह पुणे जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष बने और करीब 16 वर्षों तक इस पद पर रहे। उसी वर्ष बारामती से लोकसभा के लिए चुने गए, लेकिन बाद में अपने चाचा शरद पवार के लिए सीट छोड़ दी। इसके बाद वह महाराष्ट्र विधानसभा के सदस्य बने। 1992–93 में उन्होंने कृषि और बिजली राज्य मंत्री के रूप में काम किया। इसके बाद 1995, 1999, 2004, 2009 और 2014 में बारामती विधानसभा सीट से लगातार जीत दर्ज की।
प्रशासनिक जिम्मेदारियाँ
अपने लंबे करियर में अजित पवार ने कृषि, बागवानी, बिजली और जल संसाधन जैसे अहम विभाग संभाले। जल संसाधन मंत्री के तौर पर कृष्णा घाटी और कोकण सिंचाई परियोजनाओं की जिम्मेदारी उनके पास रही। समर्थक उन्हें एक सख्त प्रशासक और तेज़ फैसले लेने वाला नेता मानते रहे।
सत्ता तक पहुंच और उतार-चढ़ाव
2009 के विधानसभा चुनाव के बाद उप मुख्यमंत्री बनने की उनकी इच्छा चर्चा में रही, हालांकि उस समय यह पद छगन भुजबल को मिला। दिसंबर 2010 में वह पहली बार डिप्टी सीएम बने।2013 में सिंचाई घोटाले से जुड़े विवादों के चलते उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। बाद में उन्हें क्लीन चिट मिलने की बात कही गई और वह दोबारा सत्ता में लौटे।
विवादों से जुड़ा रहा सफर
अजित पवार का राजनीतिक जीवन विवादों से अछूता नहीं रहा। 2013 में उनके एक बयान 'अगर बांध में पानी नहीं है तो क्या पेशाब करके भरें?' की कड़ी आलोचना हुई थी, जिसके बाद उन्होंने माफी मांगी।
2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान मतदाताओं को धमकाने के आरोप लगे। इसके अलावा भ्रष्टाचार, पद के दुरुपयोग और लवासा लेक सिटी प्रोजेक्ट से जुड़े कथित मामलों को लेकर भी समय-समय पर सवाल उठे। इन सबके बावजूद, वह राज्य की राजनीति में प्रभावशाली बने रहे।
राजनीतिक पहचान और विरासत
अजित पवार को एक मजबूत संगठनकर्ता और प्रशासनिक अनुभव वाले नेता के रूप में देखा जाता रहा है। उनके और शरद पवार के बीच मतभेदों की चर्चाएँ भी सामने आती रहीं, लेकिन उन्होंने सार्वजनिक रूप से खुद को शरद पवार का अनुयायी बताया।
महाराष्ट्र की सत्ता राजनीति में उनकी भूमिका लंबे समय तक निर्णायक मानी जाती रही है चाहे वह सरकार गठन हो, प्रशासनिक फैसले हों या संगठनात्मक रणनीति।
