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Big News-कलेक्टरों की खैर नहीं! बेजा कार्यों में डीएमएफ का 2400 करोड़ रुपए की कर डाली फिजूलखर्ची

रायपुर, 27 जनवरी 2019। डिस्ट्रिक्ट माईनिंग फंड के नाम पर फिजूल के कामों पर अनाप-शनाप पैसा बहाने वाले कलेक्टरों की मुश्किलें अब बढ़ सकती है। भूपेश सरकार ने इसका रिव्यू कराने का फैसला लिया है। डीएमएफ के तहत विभिन्न माईनिंग से 27 जिलों को नवंबर 2018 तक 3336 करोड़ रुपए का अंशदान प्राप्त हुआ। इसमें से कलेक्टरों ने 2400 करोड़ रुपए खर्च कर डाला है। अधिकांश राशि गैर उपयोगी कार्यां में खर्च की गई। सरकार के करीबी अफसरों का कहना है कि कई कलेक्टरों ने अपनी छबि चमकाने के लिए करोड़ों रुपए बहा डाले। डीएमएफ के कामों में कमीशनखोरी का खेल भी जमकर हुआ। 27 में से आठ कलेक्टरांं के खिलाफ सरकार के पास पुख्ता शिकायत पहुंची है कि डीएमएफ के काम कमीशन लेकर स्वीकृत किया गया। पर्यावरण को दुरुस्त करने के लिए मिले पैसे से चेन्नई, मुंबई, बेंगलुरु की आईटी कंपनियों को लाखों रुपए भुगतान किए गए। दिल्ली की कई पीआर कंपनियां की इसमें चांदी हो गई। कलेक्टरों की ब्रांडिंग करने के लिए पीआर एजेंसियों ने पैसे लेकर नेशनल मीडिया में कलेक्टरों को हीरो बनाया।
ठीक ही कहा जाता है, योजनाएं तो हमेशा अच्छी ही बनती है। लेकिन, अफसरशाही और पालिटिशियन इसमें सेंध लगा डालते हैं। भारत सरकार ने डीएमएफ का प्रावधान ही इसलिए किया था कि माईनिंग इलाके के पर्यावरण और जनता के हितों की रक्षा के लिए इस राशि का उपयोग किया जा सकें। लेकिन, हुआ उल्टा। माईनिंग इलाके के विकास के लिए कलेक्टरों को इसलिए जिम्मेदार बनाया गया कि उन्हें नाहक राशि स्वीकृत कराने के लिए मंत्रालय के अफसरों एवं बाबुओं का चक्कर न लगाना पड़े। इसीलिए, कलेक्टरों को इसका चेयरमैन बनाया गया। डीएमएफ 21 लोगों की कमेटी होती है। इनमें तीन जनप्रतिनिधियों को सरकार मनोनित करती है। इसमें विधायक या सांसद कोई भी हो सकता है। तीन खदान मालिक और दो प्रभावित इलाके के सरपंच को कलेक्टर नामित करता है। इसके अलावा विभिन्न विभागों के 13 अफसर होते हैं, जो कलेक्टर के नीचे काम करते हैं। फिर, जिन खदान मालिक और सरपंच को कलेक्टर नामित करता है, वो भला कलेक्टर के खिलाफ कैसे जा सकता है। याने 21 में से 18 लोग कलेक्टर के होते हैं। तीन जो जनप्रतिनिधि होते हैं, वे भी कलेक्टर से अपना दो-एक काम कराके बाकी मामले में चुप्पी साध लेते हैं। लिहाजा, कलेक्टरों ने इस वीटो का दुरूपयोग करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। वे करोड़ों रुपए के डीएमएफ के मालिक बन बैठे। अपने हिसाब से डीएमएफ को दो हाथों से लुटाए। हालांकि, कुछ दबंग जनप्रतिनिधियों ने भी इस डीएमएफ में जमकर डूबकी लगाई। कोरबा डीएमएफ में सबसे उपर है। हर साल वहां 450 करोड़ रुपए डीएमएफ में मिलते हैं। वहां प्रदेश के एक सांसद का बेटा डीएमएफ में काम करके पांच साल में करोड़ों की मिल्कियत खड़ी कर ली।
छत्तीसगढ़ में कोरबा के बाद दूसरे नम्बर पर दंतेवाड़ा आता है। दंतेवाड़ा में 250 करोड़ रुपए का डीएमएफ है। इसके बाद रायगढ़, सरगुजा, कोरिया, बालोद और बलौदा बाजार है।

दरअसल, अमूमन मामलों में कार्रवाई होती नहीं। इसलिए, किसी को कानून का डर रहता नहीं। मालूम है, इस तंत्र में कोई देखने वाला नहीं है। इसलिए, माईनिंग की धूल और प्रदूषण खाते रहे आम आदमी और पैसा खाए अफसर और नेता। कुछ एनजीओ वाले जरूर इसमें हल्ला मचा रहे हैं। लेकिन, जाहिर है, उनके इस हल्ला के पीछे क्या है। उन्हें भी अगर डीएमएफ में से कुछ खुरचन मिल जाएगा, तो वे भी जय-जय करने लगेंगे।
इस बारे में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा है कि वास्तव में यह राशि खनन प्रभावित आबादी को हुई क्षति की भरपाई के लिए थी, लेकिन इसका उपयोग गैर जिम्मेदारी से किया गया। लिहाजा, हमने इसकी समीक्षा करने का निर्णय किया है। सीएम ने कहा कि हमने डीएमएफ के तहत चल रहे अनावश्यक निर्माण कार्यां पर रोक लगा दी है। ताकि, जनता का पैसा जनहित में इस्तेमाल किया जा सकें।

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