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असम का अतिक्रमण मसला : असम के पंद्रह ज़िलों में अतिक्रमण.. 22 प्रतिशत फ़ॉरेस्ट लैंड भी अतिक्रमणकारियों का शिकार बनी

असम का अतिक्रमण मसला : असम के पंद्रह ज़िलों में अतिक्रमण.. 22 प्रतिशत फ़ॉरेस्ट लैंड भी अतिक्रमणकारियों का शिकार बनी
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By NPG News

गुवाहाटी (दिसपुर ) 25 सितम्बर 2021। सिपाझारी गोलखुटी मसले के दस सेंकड के वीडियो वायरल होने पर देश के एक तबके में बेहद हलचल है, यह तबका दस सेंकड के उस फूटेज पर जिसमें कि एक व्यक्ति गिरा हुआ है और उस पर एक कैमरामैन कूद रहा है उसकी लानत मलामत कर रहा है, लेकिन इसकी पृष्ठभूमि पर चुप्पी साधे बैठा है।

दरअसल मसला केवल ढोलपुर इलाक़े के सिपाझारी गोलखुटी का नही है, यह मसला वह समस्या है जो अब राज्य सरकार के लिए गंभीर समस्या है। यह एक ऐसी समस्या है जिसके फेर में असम के पंद्रह ज़िले और करीब बाईस फ़ीसदी फ़ॉरेस्ट लैंड प्रभावित है। राजनीति जिसमें वोट सबसे अहम किरदार है उसने इस मसले पर हमेशा से सरकारों को दो क़दम आगे तो दस क़दम पीछे की चिर परिचित नीति पर रखा है। यह मसला है अतिक्रमण का।यह अतिक्रमण मिज़ोरम से सटे सरहदी जिलों में तो है ही यह बांग्लादेश से सटे इलाक़ों में भी है।हालाँकि दक्षिणपंथी मानी जाती असम की सरकार जहाँ भाजपा सत्ता में है उसके घोषणा पत्र में ही अतिक्रमण मुद्दा था और वायदा था कि ये हटाए जाएँगे।
इस अतिक्रमण को किसी धर्म से जोड़ कर देखने वालों को जानकर निराशा होगी कि यह मसला धर्म का है ही नही। सबसे पहले यह मुद्दा 1980 में सामने आया। 2015 में मंगलदोई ज़िले में इस मुद्दे पर न्यायालय में मामला दाख़िल किया गया जिसमें याचिकाकर्ता कोबद अली थे जिन्होंने अतिक्रमणकारियों को हटाने और ज़मीन खाली कराने की माँग रखी थी।यह मसला किसी धर्म संप्रदाय से नही बल्कि स्थानीय और अतिक्रमणकारियों के बीच का है। स्थानीय और अतिक्रमणकारियों के बीच हिंसा की घटनाएँ भी लगातार दर्ज की गई हैं। स्थानीय नागरिकों और अतिक्रमणकारियों के बीच टसल के मुद्दो में ज़मीन का मुद्दा तो है ही, साथ ही साथ बेहद अविश्वास और अतिक्रमणकारियों की उग्र छवि भी विवाद के स्थाई बिंदु के रुप में शामिल हैं।

सरकार पर हमेशा से आरोप रहा है कि इस समस्या पर समय रहते ध्यान नही दिया गया, मसले पर रहस्यात्मक चुप्पी बनी रही और वैसे भी भारत के समाचार पत्रो से नॉर्थ इस्ट को लेकर हमेशा अजीब सी उदासीनता रहती है जिसकी वजह से ये मसले फ़्रंट पेज तो दूर की बात है बतौर फिलर ( खाली जगह पूर्ति ) के काम लायक भी नही समझे जाते।
जिन्हे अतिक्रमणकारी कहा जा रहा है, उन्हे भारतीय कहा जाए या केवल घुसपैठिए यह प्रश्न का उत्तर असम के अलग-अलग ज़िलों में अलग अलग है।लेकिन इस घुस पैठ से सरकारी,जंगल की और निजी तीनों ही ज़मीनें प्रभावित हुई है यह स्थापित सत्य है।

लगातार टकराव के इतिहास के बीच अब राज्य की भाजपा सरकार इस मसले पर किसी सुलह समझौते के मानस में नही है।दरांग ज़िले में पूर्व घोषित अतिक्रमण हटाए जाने की कार्यवाही के बीच पुलिस और लोगों के बीच झड़प हो गई। 9 पुलिसकर्मियों समेत चौबीस लोग घायल हुए जबकि दो की मौत हुई।
इसी संघर्ष के दौरान जिसे लेकर प्रशासन का दावा है कि अतिक्रमण कारियों की ओर से अचानक हमला हुआ और बचाव कार्यवाही के दौरान गोली चली संघर्ष हुआ उसी में से दस सेंकड का वह फ़ुटेज है जिसमें एक व्यक्ति ज़मीन पर लेटा है और एक कैमरा पर्सन उस पर कूद रहा है।इस फ़ोटोग्राफ़र का नाम विजय शंकर बनिया है इसे गिरफ़्तार कर लिया गया है।

इस दस सेंकड के फूटेज पर सियासत केंद्रित और सरगर्म है।राजनीति इसलिये भी तेज हो गई है क्योंकि दरांग ज़िले के कप्तान सुशांत बिस्वा सरमा असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के छोटे भाई है।
बहरहाल मामले की न्यायिक जाँच की घोषणा हो चुकी है, राज्य सरकार का इस मसले पर स्टैंड बिलकुल स्पष्ट है, मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा अतिक्रमण के मसले पर ज़ीरो टॉलरेंस की नीति पर अडिग हैं।
दरांग मसले पर मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने दो टूक कहा है
”साठ परिवारों को बेदख़ल करना था लेकिन दस हजार लोग आए.. पापूलर फ़्रंट ऑफ इंडिया का नाम आ रहा है.. हम भूमिहीनों को अलग ज़मीन देने पर तैयार थे.. उन्होने मंदिर की ज़मीन पर क़ब्ज़ा कर लिया था..लेकिन न्यायिक जाँच होने तक कोई टिप्पणी नही करुंगा”

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