Chhattisgarh Tarkash 2025: एसपी की पीड़ा या दुःसाहस!

Chhattisgarh Tarkash 2025: छत्तीसगढ़ की ब्यूरोक्रेसी और राजनीति पर केंद्रित पत्रकार संजय के. दीक्षित का पिछले 17 बरसों से निरंतर प्रकाशित लोकप्रिय साप्ताहिक स्तंभ तरकश।

Update: 2026-02-01 00:30 GMT

तरकश, 1 फरवरी 2026

संजय के. दीक्षित

एसपी की पीड़ा या दुःसाहस!

छत्तीसगढ़ के कवर्धा जिले के एसपी धर्मेंद्र छवई ने प्रमोशन में नाइंसाफी को लेकर सीधे मुख्यमंत्री और डीजीपी को पत्र लिख डाला। पत्र भी सिंपल नहीं। नाराजगी और गंभीर आरोपों के साथ...फलां-फलां अफसरों का प्रमोशन किया गया तो मेरा क्यों नहीं? हो सकता है, प्रमोशन में एसपी के साथ न्याय न हुआ हो। मगर इससे बड़ा सवाल यह है कि एसपी क्या सीधे मुख्यमंत्री को पत्र लिख सकता है? सरकारी सिस्टम में मुलाजिमों को अपना पक्ष रखने का एक तरीका बनाया गया है। उपर से एसपी ऐसा करें...देश के किसी राज्य में ऐसा नहीं हुआ होगा। जाहिर है, कलेक्टर और एसपी जिलों में मुख्यमंत्री के प्रतिनिधि के तौर पर काम करते हैं। सरकार अपने पसंदीदा अफसरों को ही कलेक्टर-एसपी बनाती है। मगर कलेक्टर-एसपी ही लगे सरकार को निशाने पर लेने तो फिर उस राज्य के सिस्टम का क्या होगा? एक बड़ा प्रश्न यह भी...एसपी ने अगर सीमाएं लांघी तो सिस्टम ने क्या किया? अभी तक नोटिस या शोकॉज जारी होने की भी कोई जानकारी नहीं है। सरकार के अच्छे कामों का संदेश अगर जनता के बीच नहीं जा पा रहा तो इसके पीछे इस तरह की घटनाओं का बड़ा हाथ है।

दमदार अफसर

प्रमोटी आईपीएस अधिकारी सरकार को चमका दे...छत्तीसगढ़ बनने के 25 साल में ऐसा कभी डायरेक्ट आईपीएस अफसरों ने भी नहीं किया। मुकेश गुप्ता जैसे अब तक के सबसे दमदार आईपीएस की भी हिम्मत नहीं पड़ी। अच्छी तरह याद है...मुकेश को डीआईजी से आईजी बनने के लिए कई साल वेट करना पड़ा था। तत्कालीन डीजीपी ओपी राठौर एकदम अड़ गए थे...प्रमोशन नहीं होने दूंगा। मगर मुकेश गुप्ता ने कभी मुख्यमंत्री को पत्र नहीं लिखा। हालांकि, बाद में रमन सिंह ने डीजीपी से बात कर उन्हें मुकेश के प्रमोशन का रास्ता निकाला था। बहरहाल, मुकेश गुप्ता से अधिक डेसिंग वाले प्रमोटी आईपीएस धर्मेंद्र छवई निकले। बता दें, छवई पर बैकडोर से आईपीएस बनने का आरोप लगा था। उन्होंने रापुसे अधिकारी के रूप में पूरी नौकरी एमपी में की थी। वहां एक संवेदनशील केस में सस्पेंड हुए, एफआईआर भी हुआ। खैर, ये निजता का मामला है, इसलिए इस पर टिप्पणी मुनासिब नहीं। बहरहाल, धर्मेंद्र छवई प्लानिंग के तहत एमपी से 18 साल बाद 2018 में छत्तीसगढ़ आए। और उन्होंने छत्तीसगढ़ के रापुसे अधिकारियों के विरोध के बाद भी आईपीएस बनकर दिखा दिया कि उनमें दम तो है। धर्मेंद्र अगर एमपी में होते तो इस साल आईपीएस बनते। बैच भी 2016 या 17 मिलता। छत्तीसगढ़ में वे 2023 में आईपीएस बने और बैच भी 2013 का मिल गया। एसपी के तौर पर बेमेतरा, महासमुंद के बाद कवर्धा उनका तीसरा जिला है। छत्तीसगढ़ में इतने बड़े-बड़े लॉटरी पाने के बाद भी वे सरकार को पत्र लिख मार रहे तो इससे साबित होता है कि वे कितने साहसी पुलिस अधिकारी हैं।

सीएस, डीजीपी की जिम्मेदारी!

छत्तीसगढ़ का सिस्टम अगर डिरेल्ड हो रहा तो, कार्यपालिका की भी जिम्मेदारी बनती है। नए-नए अफसर अगर राज्यपाल के एडीसी बनने से इंकार कर दें, अफसर सरकार का आदेश न माने, पुलिस अधीक्षक नियम-कायदों को ताक पर रख सरकार को पत्र लिख दें, तो इसकी एकाउंटबिलिटी से मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक मुक्त नहीं हो सकते। सरकारी मुलाजिमों की घोर अनुशासनहीनता पर सीएस और डीजीपी अगर कोई कार्रवाई नहीं कर सकते को बुलाकर क्लास लगाने से कौन रोक सकता है। कुल मिलाकर सूबे के मुलाजिमों में अराजकता बढ़ती जा रही है। कर्मचारियों की तुलना में बड़े अधिकारी ज्यादा अनुशासनहीनता कर रहे। इसे अगर ठीक नहीं किया गया तो पूरी पौध खराब हो जाएगी।

आईजी का वसूलीबाज गैंग

पुलिस मुख्यालय जितना सक पा रहा, कार्रवाई भी कर रहा है। एक आईजी साहब ने पिच पर उतरते ही धुआंधार बैटिंग शुरू कर डाली। एक एडिशनल एसपी को गैंग का मुखिया बनाया तो दूसरे जिले के एक सिपाही को भी बुलाकर काम में लगा दिया। मगर बात पहुंच गई इंटेलिजेंस चीफ के पास। उन्होंने आईजी और एडिशनल एसपी को जमकर हड़काया। इससे ज्यादा उनके हाथ में भी नहीं। कॉन्स्टेबल को जरूर एसपी को बोल निपटवा दिया। मगर ये भी सही है कि सिस्टम जब तक सख्त संदेश नहीं देगा, तब तक अराजकता कम नहीं होने वाला।

अफसर सस्पेंड

बात अनुशासनहीनता की निकली तो यहां रायपुर पुलिस कमिश्नर के बैचमेट के निलंबन की घटना ताजा हो गई। बात 2004 की है। सरकार ने नॉन आईपीएस संजय तिवारी को बीजापुर का एसपी बनाया था। उन्होंने नक्सल प्रभावित जिले में जाने से इंकार कर दिया। इस पर डीजीपी ओपी राठौर बड़े नाराज हुए। उन्होंने खुद ही मुख्यमंत्री डॉ0 रमन सिंह से बात कर संजय तिवारी को सस्पेंड करवाया। बाद मे संजय अपने मूल कैडर एमपी चले गए।

बालाघाट आगे, जशपुर पीछे

छत्तीसगढ़ सरकार ने कुछ साल पहले तय किया था कि अब किसी को न तो एक्सटेंशन दिया जाएगा और न संविदा नियुक्ति। मगर यह संकल्प ऐसा टूटा कि ईएनसी जैसे पदों पर लगातार संविदा नियुक्ति दी जा रही। जल संसाधन के ईएनसी इंद्रजीत को रिटायर होने के बाद जुलाई 2025 में उसी पद पर छह महीने की संविदा नियुक्ति मिली थी। सुना है, उनको अब एक्सटेंशन मिल गया है। ऐसा नहीं कि वहां ईएनसी का कोई दावेदार नहीं। जशपुर के रहने वाले छत्तीसगढ़िया आदिवासी अफसर जेआर भगत ने ईएनसी के संविदा नियुक्ति के खिलाफ कोर्ट में याचिका लगाई तो पर्दे के पीछे पता नहीं क्या चकरी घुमाई गई कि उन्होंने अपनी अर्जी वापिस ले ली। बताते हैं, भगत को बैकफुट पर लाने के लिए उनकी पुरानी फाइल खोल दी गई। उधर, विभाग ने बालाघाट के इंद्रजीत को उपकृत करने ऐसा ताना-बाना बनाया कि एसई से सीई में सालों तक प्रमोशन नहीं हुआ। ताकि, इंद्रजीत को कोई रिप्लेस नहीं कर पाए। भीतरखाने में चर्चाएं ये भी है कि ईएनसी के दावेदार छत्तीसगढ़ियां मुख्य अभियंता को रिटायरमेंट के बाद संविदा पोस्टिंग का प्रलोभन दिया गया ताकि वे मुंह बंद कर लें। पता नहीं इंद्रजीत ने क्या जादू किया कि पूरे सिस्टम को जीत लिया है।

शह-मात की सियासत और गोद

पहले मध्यप्रदेश और फिर राज्य बनने के बाद 18 साल तक बिलासपुर सियासत के मजबूत केंद्र के तौर पर जाना जाता था। मगर 2019 से बिलासपुर की उपेक्षा शुरू हुई, वह निरंतर जारी है। अलबत्ता, अब तो बीजेपी के भीतर ही बिलासपुर में वर्चस्व की लड़ाई छिड़ गई है। पिछले 25 साल से अमर अग्रवाल विधायक हैं। मगर इस समय पड़ोसी जिले के डिप्टी सीएम अरुण साव की नजर बिलासपुर पर है। वे ताकत दिखाने का कोई अवसर नहीं जाने दे रहे। उधर, केंद्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू भी बिलासपुर से ही सांसद हैं। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष से लेकर नेता प्रतिपक्ष और विधानसभा अध्यक्ष रह चुके धरमलाल कौशिक बिलासपुर से हैं तो कद्दावर नेता धर्मजीत सिंह भी बिलासपुर के रहवासी हैं। छोटे मियां सुशांत शुक्ला भी जलवा जलाल में कम नहीं। उधर पिछले कुछ दिनों में बिलासपुर में दबदबा कायम करने शह-मात के खेल की कई घटनाएं हुईं, उसका मैसेज अच्छा नहीं गया। लगता है इसीलिए, मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने बिलासपुर को गोद जैसा लेने का फैसला किया।

जाहिर है, शहरों के विकास की बात आई तो सीएम ने रायपुर से पहले बिलासपुर की मीटिंग ली। इस बार 26 जनवरी को उन्होंने झंडा भी बिलासपुर में ही फहराया। 23 साल बाद बिलासपुर में किसी मुख्यमंत्री ने गणतंत्र दिवस को झंडा फहराया। तत्कालीन मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने आखिरी बार 26 जनवरी 2003 को वहां झंडारोहण किया था। इसके बाद डॉ0 रमन सिंह ने 15 साल और भूपेश बघेल ने पांच साल 26 जनवरी को जगदलपुर में झंडा फहराया। बहरहाल, CM का फोकस बढ़ा है तो हो सकता है बिलासपुर का पुराना वजन फिर लौटे। वैसे CM का पुराना संभागीय मुख्यालय बिलासपुर ही रहा है।

रिफार्म पर ब्रेक के पीछे

जमीनों के डायवर्सन के लिए लोगों को रिश्वत देने के बाद भी एसडीएम कार्यालय में काफी चप्पलें घिसनी पड़ती थी। सरकार ने इसकी तोड़ निकाला और आम आदमी को सहूलियत देने के लिए एसडीएम के जमीनों के डायवर्सन के अधिकार को समाप्त कर दिया। डायवर्सन को ऑनलाइन किया गया। कोई भी आदमी खुद ही ऑनलाइन एसडीएम के यहां अप्लाई करेगा और 15 दिन में अगर कोई एक्शन नहीं हुआ तो उसे स्वतः डायवर्टेड मान लिया जाएगा। 13 दिसंबर को नोटिफिकेशन राजपत्र में प्रकाशित भी हो गया। मगर इसके बाद राजस्व विभाग का अमला हरकत में आया। डिप्टी कलेक्टर्स और तहसीलदारों का एक प्रतिनिधिमंडल मंत्री के यहां पहुंच गया। इसका नतीजा यह हुआ कि इस महत्वपूर्ण सुधार के क्रियान्वयन पर ब्रेक लग गया।

SCR का सीईओ

छत्तीसगढ़ के स्टेट कैपिटल रीजन के लिए सरकार ने सेटअप मंजूर कर दिया है। जल्द ही नियुक्यिं शुरू हो जाएंगी। एससीआर में फर्स्ट पोस्टिंग सीईओ की होगी। सीईओ ही एससीआर का हेड होगा। पता चला है, सिकेट्री लेवल के आईएएस को इस कुर्सी पर बिठाया जाएगा। अत्यधिक संभावना है कि आवास और पर्यावरण विभाग के सिकेट्री अंकित आनंद को सीईओ की अतिरिक्त जिम्मेदारी सौंपी जाए। जाहिर है, विभागीय सचिव के नाते एससीआर का ड्राफ्ट और सेटअप तैयार करने में अंकित की भूमिका रही है।

नेता, समारोह और सोशल मीडिया

सालेक भर से शादी या जन्मदिन जैसी पार्टियों में नेताओं ने एक नया ट्रेंड शुरू किया है। मंत्री, पूर्व मंत्री या जनप्रतिनिधि आजकल पार्टियों में जा रहे तो वहां स्टेज की फोटो और फिर सोशल मीडिया में यह बताते हुए पोस्ट...फलां के यहां शादी या इस कार्यकम में शरीक होकर बधाई दिया। खैर, यह आईडिया बुरा नहीं है। टाईम निकाल नेताजी लोग ऐसे कार्यक्रमों में पहुंचते हैं, तो इसका कुछ आउटकम मिल जाए तो क्या दिक्कत?

प्यास लगने पर कुंआ खोदना

रायपुर में पुलिस कमिश्नरेट लागू हो गया मगर इसके लिए अलग से राशि का प्रावधान नहीं किया गया है। इससे संसाधनों की बात तो दूर, बैठने के ठौर-ठिकानों को लेकर दिक्कतें जा रही। पुलिस कमिश्नर संजीव शुक्ला उधारी के कार्यालय में बैठ रहे। पांच डीसीपी पोस्ट हुए हैं, उन्हें कहां बिठाया जाए, यह यक्ष प्रश्न है। पांचों एसपी लेवल के आईपीएस हैं। उन्हें सीएसपी ऑफिस में तो नहीं बिठाया जा सकता। डीसीपी सेंट्रल उमेश गुप्ता को सिविल लाइन थाने के पास ठीकठाक ऑफिस मिल गया है। मगर डीसीपी वेस्ट संदीप पटेल को आमानाका थाने के छत पर बैठना पड़ रहा है।

वहीं, डीसीपी नार्थ मयंक गुर्जर के लिए जगह का जुगाड़ नहीं बैठ पा रहा। बाकी एडिशनल डीसीपी और एसीपी को कौन पूछे? सिस्टम को कायदे से पुलिस कमिश्नर के लिए बजट का इंतजाम रखना था। क्योंकि, पुलिस कमिश्नरेट कोई ओवरनाइट नहीं बना है। करीब डेढ़ साल पहले इसकी घोषणा हुई थी। राज्योत्सव के मौके पर ही इसका उद्घाटन किया जाना था, जो किसी कारणों से नहीं हो पाया। 31 दिसंबर को कैबिनेट की बैठक में डेट का भी ऐलान कर दिया गया था। कमिश्नरेट की तैयारी के लिए 23 दिन कम नहीं होते। मगर सिस्टम ने कुछ नहीं किया। अब प्यास लगने पर कुंआ खोदने जैसा काम किया जा रहा।

अंत में दो सवाल आपसे?

1. क्या ये सही है कि पुलिस कमिश्नरेट बनने से अफसरशाही इतनी दुखी हुई कि उद्घाटन के मौके पर कोई जलसा या कार्यक्रम नहीं किया गया?

2. अफसरों की अनुशासनहीनता पर भी सिस्टम सौम्य क्यों बना हुआ है?

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