बिलासपुर में एल्डरमेन सूची जारी.. 11 में से 6 विधायक शैलेश समर्थक.. फ़ेसबुक पर अटल ने लिखा -“अन्याय हुआ तो सोचना पड़ेगा.. ग़ुलाम नहीं संघर्षशील कार्यकर्ता हैं हम सब..”

बिलासपुर,18 सितंबर 2020। आखिरकार लंबे जद्दोजहद के बाद नगरीय निकायों के लिए एल्डरमेन सुची जारी कर दी गई और घमासान तय था और वो हुआ भी। किसी ओपन सिक्रेट की तरह यह रहस्य भी सार्वजनिक है कि शहर में कांग्रेस की एकता है, बस इससे आगे आपको लिखना होगा गुटों के बीच। गुटों में बंटी कांग्रेस अपने अपने गुटों के बीच पूरी तरह एकजुट है।
यह गुटीय एकता थोड़े से विराम के बाद फिर सार्वजनिक है, इस बार मसला यह है कि अब तक शिकार साबित होते आया खुद शिकारी हो लिया है।इधर अब तक माहिर शिकारी माने गए नाराज़ हैं और चुंकि राजनीति शह मात का खेल है तो नाराज होना भी चाहिए।

कल नगरीय निकाय एल्डरमेन की सूची जारी हुई, 11 में से 6 नाम विधायक शैलेश पांडेय के क़रीबियों के हैं। दिलचस्प यह भी है कि छ में से चार नाम ऐसे हैं जिनकी टिकट बिलकुल एन वक्त पर काट दी गई थी। जिन नामों ने दो गुटों में मौजुद कांग्रेस के भीतर पटाखों का रुप लिया ( एक गुट के लिए नाराज़गी का लक्ष्मी बम दूजे के लिए हर्ष के अनार ) उनमें शैलेंद्र जायसवाल,काशी रात्रे, दीपांशु श्रीवास्तव,अजरा खान के नाम शामिल हैं। शैलेंद्र जायसवाल के नाम वाला फटाखा बिलाशक इन पटाखों में सबसे बड़ा साबित हुआ है।

विधानसभा चुनाव के ठीक पहले से लेकर हालिया दिनों तक सार्वजनिक रुप से “ढुकेले” जाते देखे गए विधायक शैलेष पांडेय के लिए सुची में समर्थकों के नाम की मौजुदगी बहुत महत्व की है। बेहद सधे तरीक़े में मुस्कुराते चेहरे के साथ शैलेष पांडेय ने प्रसिद्ध शायर राजेश रेड्डी का शेर कहा है –
“इश्क़ में ख़ुदकुशी नहीं करते…इश्क़ में इंतिज़ार करते है”
विधायक शैलेश पांडेय को लेकर यह पढ़ते हुए यह भी ध्यान रखिएगा कि, राजनैतिक विरोधी उनकी इस शैली को “शातिर” शैली की संज्ञा देते हैं।

फ़ायर ब्रांड तेवर और दो टूक बात करने वाले अटल श्रीवास्तव जो बिलासपुर कांग्रेस की सियासत में दूसरे और ताकतवर ख़ेमे के धव्जाधिपती माने जाते हैं। उन्होने बमुश्किल पच्चीस शब्द सोशल मीडिया पर खर्च किए हैं लेकिन अर्थ पर जाएँ तो यह पच्चीस शब्द भी बेहद क़ीमती समझ आते हैं। अटल श्रीवास्तव ने लिखा है –
“आज तो कुछ नही पर कांग्रेस के संघर्ष के साथियों के साथ अन्याय हुआ तो सोचना पड़ेगा…. गुलाम नही संघर्ष शील कार्यकर्ता है हम सब…”

अटल श्रीवास्तव की सियासत उनके नाम को सार्थक तो करती है। अटल मतलब अटल.. फिर सामने कोई हो.. सर्वशक्तिमान के क्षणिक दौर पर शोभायमान रहे अजीत जोगी से भिड़ंत भला कौन भूलेगा। ऐसे वक्त में जहां अटल को सत्ता शीर्ष का सर्वाधिक प्रिय प्रतिनिधि माना जाता हो वहाँ एल्डरमेन के नामों को लेकर तवज्जो ना मिले तो फटाखे तो फूंटेंगे ही. ज़ाहिर है फूट रहे हैं।
सियासत का तंबू जिन तीन बंबू पर टिका होता है उसमें खर्चा के साथ चर्चा और पर्चा नाम का बंबू होता है। ये बंबू जितने मज़बूत सियासत का तंबू उतना ही उँचा होता है। बिलासपुर कांग्रेस की सियासत में इन तीनों बंबुओं की दोनों तंबुओं में कोई कमी नहीं है।

शह और मात का यह खेल राजनीति विज्ञान के छात्रो के लिए प्रायोगिक बौद्धिक है, गौर से पन्नों को पढ़ा जाते रहना चाहिए।

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