कलेक्टरी का रिकार्ड टूटा नहीं अजीत जोगी का, 4 साल में बन गए थे कलेक्टर, सीधी में पोस्टिंग के दौरान अर्जुन सिंह के क्लोज हुए

NPG.NEWS
रायपुर, 29 मई 2020। पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी का आज देहावसान हो गया। जोगी जिस भूमिका में रहे, जिस रूप में रहे योद्धा की तरह रहे। वो चाहे अध्ययन अवस्था हो या ब्यूरोक्रेट्स के रूप में या फिर राजनीति। पढ़ाई में उनकी कोई सानी नहीं रही। भोपाल का मौलाना आजाद कॉलेज ऑफ टेक्नालॉजी में पढ़ना होनहार युवाओं का सपना होता था, जोगी वहां के गोल्डमेडिलिस्ट रहे।
इंजीनियरिंग करने के बाद जोगी यूपीएससी में बैठे और वे बिना आरक्षण के पहले आईएफएस बनें। फिर आईपीएस। और, उसके बाद आईएएस में सलेक्ट हुए। जोगी 1970 बैच के आईएएस थे।


मसूरी में ट्रेनिंग के बाद असिस्टेंट कलेक्टर के रूप में पहली पोस्टिंग जबलपुर में मिली। फिर सिहोरा के एसडीएम बनें। कुछ दिनों तक वे कटनी के एडीएम रहे।
जोगी चार साल में कलेक्टर बन गए थे। 74 में उनकी पहली पोस्टिंग सीधी में मिली। सीधी तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह का गृह जिला था। बताते हैं, सीधी से ही वे अर्जुन सिंह के क्लोज हुए। सीधी के बाद वे शहडोल के कलेक्टर बनें। फिर रायपुर और उसके बाद अर्जुन सिंह उन्हें इंदौर ले गए। इंदौर में वे 81 से 86 तक कलेक्टर रहे। करीब साढे़ चार साल। इंदौर में सवार्धिक समय कलेक्टरी करने का रिकार्ड अभी तक नहीं टूटा है।
जोगी का लगातार सबसे अधिक समय तक कलेक्टरी करने का रिकार्ड अभी भी कायम है। वे करीब साढ़े ग्यारह साल तक कलेक्टर रहे। उनके बाद कई अधिकारी दस, साढ़े दस साल कलेक्टरी की मगर लगातार नहीं। जोगी लगातार कलेक्टर रहे। 80 के दशक का उनका रिकार्ड आज तक नहीं टूटा।
उनके साथ काम किए ब्यूरोक्रेट्स बताते हैं, रायपुर में कलेक्टर रहने के दौरान ही मुख्यमंत्री के भरोसेमंद होने के कारण वे मध्यप्रदेश के प्रभावशाली आईएएस बन गए थे। इंदौर में तो उनकी तूती बोलती थी। कामकाज में भी और लोकप्रियता में भी।
85 के विधानसभा चुनाव में प्रचंड बहुमत आने के बाद भी अर्जुन सिंह मुख्यमंत्री से हटाकर पंजाब के राज्यपाल बनाकर चंडीगढ़ रवाना कर दिए गए। अर्जुन सिंह के पंजाब जाने के पहले से जोगी की कांग्रेस पार्टी से निकटता बढ़ने लगी थी। मध्यप्रदेश में अटकलें शुरू हो गई थी कि जोगी कांग्रेस ज्वाईन कर सकते हैं। मगर कांग्रेस के ही कई नेता नहीं चाहते थे कि जोगी कांग्रेस में आएं। तब मोतीलाल वोरा सीएम बन गए थे। और, दिग्विजय सिंह प्रदेश अध्यक्ष। दोनों जोगी के कांग्रेस प्रवेश से सहमत नहीं थे। जोगी के खिलाफ इंदौर में कोई फाइलें खोलने की तैयारी शुरू हो गई थी। अर्जुन सिंह को इसकी भनक मिल गई। उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी से बात की। और, रातोंरात जोगी के कांग्रेस प्रवेश का रास्ता साफ करा दिया।
जोगी कांग्रेस में शामिल होने के साथ ही राज्य सभा सदस्य बन गए। उन्हें राष्ट्रीय स्तर की कई सरकारी कमेटियों में भी नामित कर दिया गया। जोगी की अंग्रेजी भी अच्छी थी। वक्ता भी प्रखर थे। लिहाजा, राजीव गांधी ने उन्हें राष्ट्रीय प्रवक्ता का दायित्व सौंप दिया। प्रवक्ता की जिम्मेदारी में भी उन्होंने देश और मीडिया में अपनी अलग पहचान बनाई।
जोगी राजनीति में योद्धा की तरह की काम किए। मध्यप्रदेश के तत्कालीन सीएम दिग्विजय सिंह से उनकी कभी नहीं बनी। कह सकते हैं, दोनों में छत्तीस के रिश्ते थे। लेकिन, छत्तीसगढ़ बनने के बाद सोनिया गांधी ने उन्हीं दिग्विजय सिंह को पर्यवेक्षक बनाकर रायपुर भेजा और दिग्विजय ने 31 अक्टूबर 2000 को अजीत जोगी को सीएम निर्वाचित करवा दिया।
सीएम बनते ही जोगी ने सबसे बड़ा फैसला किया बिजली बोर्ड के बंटवारे का। सियासी पंडित भी इस पर हैरान रह गए। दूसरा सीएम होता तो शायद ऐसा संभव नहीं था। क्योंकि, एमपी में भी कांग्रेस की ही सरकार थी। सीएम दिग्विजय सिंह को भी इस फैसले से बड़ा करंट लगा। मध्प्रदेश की बिजली व्यवस्था चरमरा गई। वहीं, छत्तीसगढ़ में जीरो पावर कट स्टेट बन गया। जबकि, उससे पहिले छत्तीसगढ़ में घंटों बिजली गुल रहती थी। और, यहां की बिजली से मध्यप्रदेश और मालवा गुलजार रहता था।
2004 में सड़क हादसे में जख्मी होने के बाद जोगी पिछले 16 साल से व्हील चेयर पर थे। लेकिन, सियासत के इस योद्धा का कभी हौसला नहीं डिगा। कह सकते हैं, छत्तीसगढ़ की राजनीति जोगी की ईर्द-गिर्द घूमती रही। पिछला विधानसभा चुनाव में भी बहुजन समाजवाद पार्टी से गठबंघन कर पार्टी की झोली में सात सीट डालने में कामयाब रहे। 2018 के विस चुनाव में अगर कांग्रेस के पक्ष में एकतरफा वोट नहीं पड़े होते तो निश्चित तौर पर जोगी आज किंगमेकर की भूमिका में होते।

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