2003 बैच के अफसरों को IAS-IPS अवार्ड ना किया जाये….. वर्षा डोंगरे का मुख्यमंत्री को 3 पन्ने का पत्र, लिखा- “2016 से मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित, बिना फैसला अवार्ड दिया जाना पद की छवि धूमिल करेगा”

रायपुर 13 जून 2020। हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज कर भले ही 2003 PSC से चयनित अफसरों ने राहत पा ली हो…लेकिन आने वाले दिनों उनकी मुश्किलें बढ़ सकती है। 2003 PSC परीक्षा परिणाम को कोर्ट तक ले जाने वाली याचिकाकर्ता वर्षा डोंगरे और संतोष कुंजाम ने मुख्यमंत्री को इस मामले में पत्र लिखकर 2003 बैच के राज्य प्रशासनिक व पुलिस सेवा के अफसरों को IAS व IPS अवार्ड नहीं देने की मांग की है। वर्षा डोंगरे ने इस संदर्भ में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के फैसले के उस संदर्भ को भी जोड़ा है, जिसमें कोर्ट ने परीक्षा परिणाम को पुनर्निधारित करने का निर्देश दिया था।

पत्र में हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता रही वर्षा ने लिखा है कि भ्रष्टाचार से चयनित अधिकारियों को लंबे समय से सेवा में रखने से छत्तीसगढ़ प्रशासन की छवि धूमिल हुई है, ऐसे में अगर उन अफसरों को IAS-IPS अवार्ड हुआ तो पूरे भारतीय प्रशासनिक व पुलिस सेवा की छवि धूमिल हो जायेगी।  अपने तीन पेज के पत्र में वर्षा डोंगरे ने बिंदुवार पूरे चयन प्रक्रिया और मामले में कूट रचना का जिक्र किया है।

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वर्षा डोंगरे और संतोष कुंजाम ने पत्र में लिखा है कि 2003 में फर्जीवाड़ा कर चयन होने वाले अभ्यर्थियों का पूरा प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट में साल 2016 से ही विचाराधीन हैं, लिहाजा मामले में फैसला नहीं आने तक 2003 बैच के अफसरों को भारतीय पुलिस और प्रशासनिक सेवा के लिए अनुशंसित करना करना सही नहीं होगा।

क्या था 2003 PSC का पूरा मामला

साल 2003 में हुई पीएससी परीक्षा के स्केलिंग सिस्टम में हेराफेरी कर अपात्र लोगों को डिप्टी कलेक्टर व डीएसपी बनाये जाने के आरोप के साथ हाईकोर्ट में याचिका दायर की गयी थी। इस मामले में सालों तक चली सुनवाई के बाद साल 2016 में हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक गुप्ता ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए 2003 की पीएससी परीक्षा में गड़बड़ी और भ्रष्टाचार साबित होने की बात कही थी। उन्होंने इस मामले में आदेश दिया था कि  मानव विज्ञान विषय की कॉपियां फिर से जांची जाएं और नई स्केलिंग कर फिर मेरिट लिस्ट बनाई जाए। कोर्ट के इस फैसले के बाद पिछले 10 से भी अधिक सालों से डिप्टी कलेक्टर, डीएसपी और दूसरे अधिकारी बनकर काम कर रहे 56 लोगों का डिमोशन होने का खतरा मंडराने लगा था।

 

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