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जीएडी का कमाल

8 अप्रैल
तीन महीने के भीतर यह दूसरा मौका होगा, जब सरकार को आईएएस, आईपीएस पोस्टिंग के अपने फैसले बदलने पड़े। याद होगा, एसपी के ट्रांसफर में एमआर अहिरे को बीजापुर और मोहित गर्ग को गरियाबंद का एसपी बनाया गया था। लेकिन, 15 दिन के भीतर अहिरे को हटाकर गर्ग को बीजापुर का एसपी बनाना पड़ा। बीजापुर में जब नक्सली घटनाएं यकबयक बढ़ने लगी तो सरकार को लगा अहिरे को वहा पोस्ट करके भूल हो गई। पिछले हफ्ते आईएएस की लिस्ट में भी कुछ ऐसा ही हुआ। अंबलगन पी को पहले मार्कफेड से हटाकर सिकरेट्री पीएचई का प्रभार दिया गया। और, राजभवन के डिप्टी सिकरेट्री जन्मजय मोहबे को एमडी मार्कफेड का। लेकिन, चौथे दिन अचानक आर्डर में संशोधन करते हुए जीएडी ने अंबलगन को पीएचई के साथ फिर से मार्कफेड और मोहबे को बीज विकास निगम भेज दिया। याने चार दिन के भीतर मोहबे का दो ट्रांसफर। उपर से ट्रांसफर के 12 दिन बाद भी मोहबे राजभवन से रिलीव नहीं हुए हैं। कारण, उनकी रिलीवर रोक्तिमा राय रायगढ़ से अभी तक आई नहीं हैं। रोक्तिमा के आए बिना राजभवन मोहबे को रिलीव करेगा नहीं। और, मोहबे रिलीव नहीं होंगे तो आलोक अवस्थी बीज विकास निगम का चार्ज किसे देंगे। सब जीएडी का कमाल है।

पी का अंतर

आईएएस के ट्रांसफर में बीज विकास निगम के एमडी आलोक अवस्थी को सरकार ने कमिश्नर एग्रीकल्चर बनाया है। यह कैडर पोस्ट तो है, मगर राज्य में इसका कोई अस्तित्व नहीं है। 13 साल पहिले बीएस प्रजापति कमिश्नर रहे। उनके हटने के बाद इस पोस्ट को लोग भूल गए थे। 4 अप्रैल को सरकार ने आलोक के लिए झाड़-पोंछकर जब कमिश्नर के पद को आलमारी से बाहर निकाला तो लोगों को चौंकना स्वाभाविक था। क्योंकि, आलोक को गाड़ी-घोड़ा के साथ ही बैठने की व्यवस्था खुद करनी होगी। हालांकि, सात अप्रैल की शाम सरकार ने आदेश में संशोधन करते हुए आलोक को कमिश्नर के साथ डायरेक्टर का भी प्रभार दे दिया। मगर आश्चर्यजनक सत्य यह है कि कृषि प्रधान राज्य में कृषि विभाग का ये हाल है कि उसके पास कोई पूर्णकालिक डायरेक्टर नहीं है। और जो प्रभारी डायरेक्टर हैं, उनके पास बैठने के लिए अपना कोई आफिस नहीं है। कृषि विश्वविद्यालय के कैम्पस में उधारी में कमरा लेकर प्रभारी डायरेक्टर बैठते हैं। उधर, इस पोस्टिंग पर मंत्रालय में लोग चुटकी ले रहे हैं….कृषि विभाग में अब दो-दो कमिश्नर होंगे। सुनील कुजूर एग्रीकल्चर प्रोडक्शन कमिश्नर याने एपीसी। और आलोक एग्रीकल्चर कमिश्नर। दोनों में सिर्फ पी का अंतर रहेगा। अंग्रेजी वर्णमाला का पी। वो वाला पी नहीं….आप इसका कुछ और मतलब मत निकालियेगा।

इलेक्शन रिकार्ड

पिछले चार साल में अगर किसी आईएएस का सबसे अधिक ट्रांफसर हुआ होगा, तो उनमें आलोक अवस्थी का नाम शायद सबसे उपर होगा। चार साल में उनके चार विभाग बदले। आलोक सिर्फ ट्रांसफर का रिकार्ड नहीं बना रहे हैं, बल्कि चुनाव कराने में भी नए कीर्तिमान की ओर बढ़ रहे हैं। कर्नाटक चुनाव को मिलाकर उनकी बारहवीं इलेक्शन ड्यूटी होगी। छत्तीसगढ़ में सर्वाधिक इलेक्शन ड्यूटी का रिकार्ड एसीएस सुनील कुजूर के नाम दर्ज था। लेकिन, आलोक ने पिछले साल उनका रिकार्ड तोड़ दिया। अगले साल रिटायरमेंट से पहिले वे राजस्थान विधानसभा और उसके बाद लोकसभा का चुनाव कराएंगे। याने चौदह चुनाव। हालांकि, आलोक का रिकार्ड दो-एक साल से ज्यादा नहीं टिकने वाला। भूवनेश यादव तेजी से उनका पीछा कर रहे हैं। जल्द ही वे आठवां चुनाव कराने कर्नाटक रवाना होंगे। याने आलोक से सिर्फ चार पीछे। लेकिन, अभी उनकी नौकरी 18 साल बाकी है। जाहिर है, भूवनेश काफी आगे निकल जाएंगे।

संपत्ति का सवाल

वन विभाग से बाहर स्टेट डेपुटेशन पर पोस्टेड आईएफएस अफसर अभी तक विभागीय सचिव को कोई भाव नहीं देते थे। उनको लगता था कि वे तो सरकार में हैं….उनका कोई क्या कर लेगा….जब वन विभाग लौटेंगे तो देखा जाएगा। लेकिन, एसीएस फॉरेस्ट सीके खेतान ने जरा-सी चाबी क्या घुमाई, उन्हें दुआ-सलाम करने वाले अफसरों की लाइन लग गई है। दरअसल, खेतान ने आईएफएस की संपत्ति को लेकर क्वेरी चालू कर दी है। कुछ अफसरों ने जायदाद छुपाने के चक्कर में गल्तियां खूब की है। एक आईएफएस ने किसी साल कोई जमीन अपनी मां के नाम दिखाया है तो अगले साल वही जमीन पत्नी के नाम। तो तीसरे साल उसे ससुर से दान में मिलना बता दिया। ऐसे में, आईएफएस की परेशानी बढ़नी लाजिमी है।

बस्तर कलेक्टर कौन?

पीएम विजिट की वजह से भले ही कलेक्टरों का ट्रांसफर आगे-पीछे हो रहा है। लेकिन, महत्वपूर्ण यह भी है कि कुछ जिलों में कलेक्टर के लिए सरकार को विकल्प भी नहीं मिल रहे। मसलन, जगदलपुर। 5 अप्रैल को हाई लेवल पर एक घंटा चर्चा के बाद भी नाम फायनल नहीं हो पाया। खासकर, बस्तर के लिए सरकार को कोई नाम नहीं सूझ रहा है। लिस्ट बनती है, फिर कट जाती है। कवर्धा को लेकर भी उलझन की स्थिति है। वहां के लिए दो नाम सबसे उपर हैं, अवनीश शरण और सौरभ कुमार। इसी तरह प्रियंका शुक्ला का अगर जांजगीर हुआ तो अवनीश और सौरभ में से किसी एक को धमतरी भेजा जाएगा। ब्राम्हण बहुल बेमेतरा में जितेंद्र शुक्ला को भेजा जा सकता है। फिर पीएम विजिट कराने के बाद बीजापुर कलेक्टर अयाज तंबोली के लिए भी ठीक-ठाक जिला ढूंढना होगा। लिस्ट बनने में दिक्कत इसलिए जा रही है, क्योंकि, बड़े जिलों में सिर्फ बस्तर और दुर्ग कलेक्टर ही चेंज हो सकते हैं। दुर्ग का चांस थोड़ा कम ही है। रायपुर, बिलासपुर, अंबिकापुर, कोरबा और रायगढ़ में से एक को छोड़कर बाकी जिलों के कलेक्टरों को सरकार फिलहाल टच करने के मूड में नहीं है। बहरहाल, अभी फायनल कुछ भी नहीं हुआ है। जो भी है, वह सिर्फ चर्चा में है।

अब जुरी की बारी

अग्रवाल अफसरों के अब अच्छे दिन आ गए हैं। पहले आईपीएस केसी अग्रवाल को कैट ने राहत देते हुए भारत सरकार के उस फैसले को निरस्त कर दिया, जिसमें उन्हें फोर्सली रिटायर किया गया था। और, अब आईएएस बाबूलाल अग्रवाल के मामले में ऐसा ही आदेश आया है। बाबूलाल का आदेश तो वास्तव में चमत्कारिक है। और, सरकारी मशीनरी के लिए आंख खोलने वाला भी कि जल्दीबाजी और उतावलेपन की बजाए ठोक-बजाकर कार्रवाई करनी चाहिए। ताकि, वह स्टैंड कर सकें। बहरहाल, दोनों अग्रवालों के बाद अब दो पत्नी वाले एएम जुरी को भी कैट से राहत मिलना तय दिख रहा है। जुरी की सुनवाई अब अंतिम चरण में है।

राउत की कमी

प्रधानमंत्री विजिट के मौके पर सरकार को एमके राउत की कमी खल रही है। राउत ऐसे अफसर थे, जिन्हें पीएम के प्रवास की व्यवस्था की जिम्मेदारी देकर सरकार भूल जाती थी। उपर वालो को भरोसा रहता था कि राउत के रहते भीड़ से लेकर सब इंतजाम हो जाएगा। लेकिन, इस बार जिम्मेदारी तय करने को लेकर सरकार काफी उलझन में रही। काफी विचार-विमर्श के बाद बीजापुर का जिम्मा एसीएस होम बीवीआर सुब्रमण्यिम और जांगला, जहां ग्रामीण विकास की प्रदर्शनी होनी है, की जिम्मेदारी एसीएस पंचायत आरपी मंडल को सौंपी गई है।

इतिहास दुहाराता है

अजीत जोगी के हेलिकाप्टर को लैंड करने की इजाजत देने से बीजापुर प्रशासन ने मना कर दिया है। वजह, पीएम विजिट के कारण हेलीपैड का रिपेयरिंग किया जा रहा है। इस खबर से 2003 विस चुनाव के समय की घटना बरबस याद आ गई। बिलासपुर मेंं विद्याचरण शुक्ल की सभा थी। तय कार्यक्रम के अनुसार राजा रघुराज सिंह स्टेडियम में उनका हेलिकाप्टर उतरता। लेकिन, एक दिन पहिले डिस्ट्रिक्ट एडमिनिस्ट्रेशन ने वीसी का हेलिकाप्टर उतरने से मना कर दिया। वो भी बिना किसी वजह। वीसी तब अंबिकापुर में थे। उन्हें सड़क मार्ग से रातोरात बिलासपुर के लिए निकलना पड़ा था।

अंत में दो सवाल आपसे

1. आईएएस के ट्रांसफर में अपने विभाग में एक अफसर को बिठाना किस मंत्री को नागवार गुजरा?
2. पीसीसी चीफ भूपेश बघेल के पिता की सक्रियता से भूपेश को लाभ होगा या नुकसान?

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